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सालासर बालाजी का सम्पूर्ण इतिहास

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salasar


आज से लगभग पाँच सौ वर्ष पूर्व स्थानीय गण्डासों की ढाणी में भीषण पेयजल का संकट उत्पन्न हुआ था। सारे ग्रामवासी त्राहि-त्राहि कर रहे थे। इस संकट की घड़ी में उक्त ग्राम में एक साधू का आगमन हुआ। ग्रामवासी के आग्रह पर उन्होंने सूंघकर बताया कि यह स्थान पेयजल के लिये सर्वथा उपयुक्त है, किन्तु इस स्थान पर बनने वाला कुआँ एक जीवित व्यक्ति की बलि चाहता है, अर्थात्‌ इस कुए को जो भी व्यक्ति खोदेगा, वही व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त होगा। उक्त सन्यासी की ऐसी वाणी सुनकर ग्रामवासियों ने मन में विचार किया कि जान देने से अच्छा यही है कि हम और कहीं से पानी लायें और अन्त में उन सभी ने कुआ न खोदने का निश्चय किया। इस समय के वर्तमान स्थानीय पुजारियों के पूर्वज श्री मोटारामजी ने मन में संकल्प किया कि यदि एक व्यक्ति के बलिदान से बाकी सभी को जल की सुविधा प्राप्त हो तो मैं स्वयं अपने प्राणों की बलि दूंगा। ग्रामवासियों के बहुत मना करने के पश्चात्‌ भी उन्होंने कुआ खोदने का कार्य प्रारम्भ किया। प्राप्त जानकारी के अनुसार उदर-शूल की प्राणघातक  पीड़ा से तत्काल उनकी मृत्यु हो गई।
नागौर के खाम्याद ग्राम में श्री मोटारामजी की धर्मपत्नी श्रीमती मोला देवी दही बिलो रही थीं कि उनकी सुहाग की निशानी हाथों की चड़ियां चटक गयीं। उनकी अन्तरात्मा को सत्यता का भान हो गया। उन्होंने अपनी माँ से कहा कि मेरे पतिदेव का स्वर्गवास हो गया है। मैं ससुराल जाऊँगी। इतना कहते हुए वे अपने घर से निकल  पड़ी । सालासर पहुंचकर अपने पति पण्डित मोटारामजी के पार्थिव शरीर सहित शक्ति में विलीन हो गई। इस दौरान स्थानीय ग्रामवासियों द्वारा उनसे कई प्रश्नोत्तर हुए तब श्रीमती मोलादेवी ने अपने परिवार वालों को इस कुए का जल नहीं पीने का आदेश देते हुए कहा कि तुम लोगों को गण्डास शाखा के जाट जल पिलायेंगे, अगर वे जल नहीं पिलायेंगे तो उनका वंश नष्ट हो जायेगा।
                इसी के कुछ वर्षों के पश्चात्‌ सती के उक्त आदेश की अवमानना करने के कारण एवं जल भरकर लाने को अस्वीकार करने पर इस शाखा के यहां पर बसे सारे गण्डास जाट समूल नष्ट हो गये और उनके स्थान पर तैतरवाल शाखा के जाट रहने लगे। इसी कारण से इसे तैतरवालों की ढाणी अर्थात्‌ छोटा गांव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उक्त जाटों ने बीच गांव में एक अन्य कुआ निर्मित किया, जिसे इस समय गांवाई कुआ के नाम से पुकारा जाता है।
                आज से लगभग तीन सौ दस वर्ष पूर्व रावजी के शेखावत पूर्णपुरा में रहने लगे जिसे पूर्व में गुगराणा गांव कहते थे। शेखावतजी सीकर के रेवासा ग्राम से आये थे।
गुगराणा ग्राम के ठाकुर बनवारीदासजी नौरंगसर (चूरू) में आकर रहने लगे। उनके पुत्र तुलछीरामजी के चार पुत्र थे, जिसमें सालमसिंह सबसे बड़े थे। ये चारों भाई चार स्थानों में अलग-अलग रहते थे, जिनके नाम क्रमशः नौरंगसर, त्रिलोकी , जुलियासर तथा सालमसर हैं। ठाकुर सालमसिंह के उक्त स्थान पर निवास करने पर तैतरवालों की ढाणी को ही 'सालासर' नाम से जाना जाने लगा और कालान्तर में सालमसर का परिवर्तित नाम ही 'सालासर' है। इसी ग्राम में पं. सुखरामजी निवास करते थे। इनके पूर्वज रेवासा ठाकुर के यहां धान कूंतने (अंकन) का कार्य करते थे और इसी के साथ ही पौरोहित्य कार्य भी सम्पन्न कराते थे। इनका विवाह सीकर के रूल्याणी ग्राम के रहने वाले पं. लच्छीरामजी पाटोदिया के आत्मजा कान्ही देवी के साथ सम्पन्न हुआ। ये परिवार सहित सुखपूर्वक जीवन-यापन कर रहे थे। ठाकुर सालमसिंह जब यहां आये तो उनकी पं. सुखरामजी से आत्मीयता हो गयी, किन्तु भाग्य की विडम्बना पण्डित सुखरामजी का पुत्र जब शिशुकाल में था, तब पण्डित जी का स्वर्गवास हो गया। उस वक्त उनका प्राणप्यारा पुत्र मात्र ५ वर्ष की उम्र का था। रूल्याणी ग्राम से पं. लच्छीरामजी के छहों पुत्र सालासर आ पहुंचे और अपनी शोकाकुल बहन को सांत्वना दी। इसके पश्चात्‌ कान्हीं अपने अबोध पुत्र को लेकर भाइयों सहित मायके चली गई। पं. सुखरामजी के चाचा पं. खींवारामजी थे। वर्तमान समय में इनके वंश-वृक्ष के पांच परिवार यहां निवास करते हैं।

सालासर


                पं. सुखरामजी के एक अन्य भाई थे। जनश्रुति के अनुसार एक बार सालासर का एक यात्रियों का काफिला नागौर के टीडियासर ग्राम के पास से गुजरा तभी वहां महन्तजी मिले और उन्होंने पूछा कि आप सब लोग कहाँ के निवासी हैं त्र, यात्रियों ने बताया कि हम सालासर ग्राम के निवासी हैं, तब महन्तजी ने पुनः पूछा कि वहाँ सब कुशल तो है ? जब यात्रियों ने पण्डित सुखरामजी की मृत्यु का सामचार सुनाया तो महन्तजी अश्रुपूरित नेत्रों से बोले कि पं. सुखरामजी मेरे सहोदर भ्राता थे। रूल्याणी ग्राम के पं. लच्छीराम जी पाटोदिया के 6 पुत्र एवं एक पुत्री उत्पन्न हुई। भाइयों और बहन में छोटे मोहनदास बाल्यकाल से ही श्रीहनुमत्‌ भक्त थे। जैसा पण्डित स्वरूपनारायणजी द्वारा सं. 2024 में रचित लावणी की इन पंक्तियों से स्पष्ट है -
दाधीच द्विज सूंटवाला, सालासर में थे सुखरामजी।
पाटोद्‌या लच्छीरामजी की लड़की थी कान्हीं नाम जी॥
षट्‌ पुत्र पुत्री सातवीं जनमी रूल्याणी ग्राम जी।
छोटा ही छोटा पुत्र मोहनदास था गुणधाम जी॥
                पं. श्री लच्छीरामजी के सबसे छोटे पुत्र मोहनदास के नामकरण के समय ही ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि आगे चलकर यह बालक एक तेजस्वी सन्त पुरूष बनेगा, जिसका यश दुनिया में चहुंदिश विस्तृत होगा। बचपन से ही उनकी गम्भीर मुख-मुद्रा को देखकर ऐसा प्रतीत होता था कि जैसे वह भगवान के ध्यान में मगन हैं। ऐसा पूर्वजन्म के पुण्य-प्रताप से ही सम्भव है। कालान्तर में पण्डित लच्छीरामजी के देहान्त के पश्चात्‌ मोहनदास अपना अधिकांश समय ईश्वर के स्मरण में व्यतीत करने लगे। साथ ही उन्हें परिवार एवं संसार से विरक्ति उत्पन्न होने लगी। सामूहिक परिवार में अधिक समय तक साथ न रहने का विचार का कान्हीं बाई ने सालासर में आने का संकल्प किया। मोहन ने अपने भाइयों से पूछा कि बहन के ये संकटपूर्ण दिन किस प्रकार व्यतीत होंगे ? उन्हें तो सहारे की आवश्यकता है। हम भाइयों में एक को भानजे उदय के  बड़े होने तक वहाँ कृषि कार्य में सहयोग करना चाहिए।
सुन भाय्याँ उत्तर दियो, म्हांक टाबरी साथ जी।
रहयां सरे नहीं एक पल, सुनो हमारे भ्रात जी॥
दुख मेटन भगनि का मोहन, सालासर में रहा सुजान।
निज भक्त जान के विप्र मोहन की, भक्ति लखि उरम्यान॥
                किन्तु पांचों भाइयों ने उत्तर दिया कि हम तो बाल-बच्चे वाले हैं और बहन का अन्न नहीं ग्रहण कर सकते, इसलिए वहाँ रहने में हम सब असमर्थ हैं। भाइयों के द्वारा यह सुनकर मोहनदासजी का मन उदास हो गया कि सगे भाई भी विपत्ति में साथ छोड  देते हैं। तब उन्होंने अपने मन में दृढ -संकल्प किया कि मैं स्वयं बहन के पास रहूँगा और बोले- बहन, मैं आजीवन तेरे साथ रहूँगा। इन भाइयों को यहीं रहने दो। तुम अपने मन में कोई दुःख मत लाओ। मैं तुम्हारे साथ हूँ। इस प्रकार समझाकर मोहनदासजी अपने जन्मस्थान रूल्याणी से विदा होकर बहन के साथ ही सालासर में उसके घर में रहने लगे। इसी के साथ ईश्वर की भक्ति भी करते रहे। कुछ ही वर्षों के परिश्रम से मोहनदासजी ने अपनी बहन के खेतों को सोना उगलने वाले उपजाऊ बना दिये। कुछ समय पश्चात्‌ पं. सुखरामजी के भाई जो टीडियासर में महन्त थे, उनकेसहयोग से नागौर के ग्राम रताऊ निवासी एक ब्राह्मण की सुशीला पुत्री के साथ अपने भानजे उदय का विवाह कर दिया। सर्वगुण सम्पन्न नव-वधु घर आ गई। कान्ही बाई के घर मंगलाचार होने लगे और इसी के साथ उनके घर में लक्ष्मी का आगमन होने लगा। कान्ही बाई के घर भूखों को भोजन, प्यासे को पानी, राही को ठिकाना और विश्राम मिलने लगा। कोई भिक्षुक खाली हाथ नहीं लौटता था। याचकगणों का आशीर्वाद भी उन्हें प्राप्त होता था, क्योंकि परोपकार की भावना से दिया गया दान का फल दिन-दूना, रात-चौगुना होता है।

सालासर


      बालक मोहनदास को भक्ति की प्रेरणा उनके पूज्य पिता पण्डित लच्छीरामजी से बाल्यवस्था में ही मिल चुकी थी, परन्तु स्वयं पवन-पुत्र हनुमानजी के द्वारा मोहनदासजी को भक्ति की प्रेरणा का प्राप्त होना एक अलौकिक प्रसंग है।
उस वक्त आय मोहन को कहे, महावीर स्वामी आप जी।
गण्डासी खोश बगाय दी, मत कर दे पापी पाप जी॥
रैन दिन हरि को भजो, और जपो अजपा जाप जी।
सब माफ औगुण गण हरे, त्रय ताप तन कर साफ जी॥