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सालासर बालाजी का सम्पूर्ण इतिहास

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  श्रावण मास में एक दिन उदयरामजी खेत में हल चला रहे थे और मोहनदासजी बंजर भूमि को कृषि के योग्य बना रहे थे। स्वयं हनुमानजी ने साक्षात्‌ प्रकट होकर उन्हें कृषि के कार्य से रिक्त होने का आदेश दिया और मोहनदासजी के हाथ से गण्डासी छीनकर दूर फेंक दी, किन्तु वे उसे उठाकर पुनः सूड़ करने लगे, फिर हनुमानजी ने गण्डासी छीनकर फेंक दी और ईश्वर भजन करने का आदेश दिया। इस प्रकार यह लीला कई बार हुई। उदयरामजी दूर से यह सब देख रहे थे कि मामाजी बार-बार गण्डासी दूर फेंकते हैं और दुबारा उसे उठा लाते हैं, उन्हें  बड़ा आश्चर्य हुआ। वे हल छोडकर पास में आये और उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछा कि आपका चित्त ठीक नहीं है, आप दो  घडी आराम कर लीजिये, किन्तु मोहनदासजी ने बताया कि कोई देवता मेरे पीछे  पड़े हैं, मेरा चित्त ठीक नहीं है। इस घटना की चर्चा साचंकाल उदयरामजी ने अपनी माँ से की और कहा कि मामा का मन काम में नहीं लगता है, अगर हम इनके भरोसे रहे तो इस बार धान की फसल नहीं होगी। कान्ही बाई के मन में यह विचार आया कि मोहन का विवाह अभी तक नहीं हुआ है, यदि इन्हें विवाह बन्धन में बान्ध दिया जाये तो इनका चित्त स्थिर हो जायेगा और अगर अपने भाई का विवाह नहीं किया तो यह सन्यासी हो जायेगा। फिर लोग क्या कहेंगे ? ऐसा सोचकर बहन अपने भाई मोहनदास के विवाह-सम्बन्ध के लिए प्रयास करने लगी।

सालासर


मामा कहे बेटा हुयो, मामो भी मुटियार जी।
विवाह सगाई इनका, जल्दी है करने सार जी॥
      कान्ही बाई के द्वारा विवाह के सम्बन्ध में पूछने पर हर बार मोहनदासजी मना कर देते थे, लेकिन बहन ने सोचा कि भाई संकोच के कारण मना करता है, इसलिए वह विवाह की तैयारी में लगी रही। बहुत प्रयास करने के बाद एक लड़की से सगाई तय हुई। सस्ते भाव में अनाज की बिक्री करके सगाई में देने के लिए सोने के गहने बनवाये एवं नाई को लडकी   के घर नेगचार करने के लिए भेजा, किन्तु वहाँ पहुँचने से पूर्व ही उस कन्या की मृत्यु हो गई। भक्त मोहनदासजी ने उक्त घटना के सम्बन्ध में भविष्यवाणी पूर्व में ही कर दी थी। अब सबको उनसे इस ज्ञान पर आश्चर्य हुआ। इसके पश्चात्‌ कान्ही बाई ने उनके विवाह के लिए पुनः नहीं कहा और वे स्वयं भी ईश्वर का भजन करने लगीं, उपरोक्त घटना के बाद भक्त मोहनदासजी जीवन-पर्यन्त ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए मौनव्रत धारण करके कठिन तपोमय जीवन व्यतीत करने लगे।
      कुछ समय पश्चात्‌ कान्ही बाई के घर भगवान हनुमानजी साधु का रूप धरकर भिक्षा माँगने आ गये, जिस प्रकार भक्त भगवान के दर्शन को तरसते हैं, ठीक उसी प्रकार से भगवान भी अपने प्यारे भक्तों को जाकर दर्शन देते हैं।
एक दिन कानी, उदय मोहन, यह भोजन कर रहया।
साधु का धर के भेष, आ हनुमान हाका कर गया॥
आया जी म्हे, आया जी म्हे, दो चार बेरी यूँ कहा।
मोहन कहे तूं घाल आटो, बाई कानी कर दया॥
उस समय कान्ही बाई मोहनदास और उदय को भोजन करा रही थीं। इस कारण से उन्हें भिक्षा देने में  देर हो गई। थोड़ी देर में कान्ही बाई ने द्वार पर देखा तो वहाँ कोई नहीं था, जब वह वापस अन्दर आई तो उन्हें उसी साधु की उपस्थिति का ज्ञान हुआ, किन्तु देखने पर कोई दिखाई नहीं  पड़ा । इसके बाद मोहनदासजी ने बताया कि ये तो स्वयं बालाजी महाराज थे, जो दर्शन देने आये थे। तब कान्ही बाई ने भाई से आग्रह किया कि भगवान बालाजी के दर्शन हमें भी कराओ। दो माह पश्चात्‌ दुबारा भगवान श्री हनुमानजी ने द्वार पर आकर नारायण हरी, नारायण हरी का उच्चारण किया। तब कान्ही बाई ने मोहनदासजी को बताया कि कोई साधु बाहर  खड़ा है, इतना सुनकर मोहनदासजी द्वार पर आये और देखा तो श्री बालाजी वापस जा रहे थे, वे उनके पीछे-पीछे  दौड़े काफी दूर जाने पर सन्त वेशधारी बालाजी ने उनकी परीक्षा लेने के लिए उन्हें डराया-धमकाया, लेकिन भक्त अपने भगवान से कहाँ डरते हैं, मोहनदासजी ने हनुमानजी के चरण-कमलों को मजबूती से पकड  लिया। तब हनुमानजी ने उनसे कहा कि तुम मेरे पीछे-पीछे मत आओ। मैं तुम्हारी निश्छल भक्ति से प्रसन्न हूँ। तुम जो भी वर माँगोगे, मैं तुमको अवश्य दंगा। मोहनदासजी ने हाथ जोड कर हाथ बहन कान्ही बाई के निवास स्थान पर अवश्य चलिये।
यों बोले हनुमान चलें हम, तुमको ये वचन निभाने होंगे।
खीर खांड सूं भोजन, सेज अछूति सोयेंगे॥
मोहनदास मंजूर किया, जब कहा प्रकट यहाँ होवेंगे।
वनदान दिया हम, भजन करने से पाप तेरे सब खोवेंगे॥
                भक्त वत्सल श्री हनुमानजी महाराज ने उत्तर दिया, मैं अवश्य चलूंगा, किन्तु मैं केवल पवित्र आसन पर ही बैठूँगा और मिश्री सहित खीर व चूरमें का नैवेद्य ही स्वीकार करूँगा। भक्त शिरोमणि मोहनदासजी द्वारा सभी प्रकार के आश्वासन देने तथा अत्यधिक प्रेम व आग्रह से परम कृपालु श्री बालाजी महाराज उनकी बहन कान्ही बाई के घर पधार गये और खीर व खांड से बना हुआ चूरमा खाकर बहुत प्रसन्न हुये। भोजन के पश्चात्‌ विश्राम करने के लिए पहले से तैयार शैय्या पर विराजमान्‌ हुए।  भाई -बहन की निश्छल सेवा-भक्ति से प्रसन्न होकर श्री बालाजी ने कहा कि कोई भी मेरी छाया (आवेश) को अपने ऊपर करने की चेष्टा नहीं करेगा। श्रद्धा सहित जो  भेंट दी जायेगी, मैं उसको प्रेम के साथ ग्रहण करूँगा और अपने भक्त की हर मनोकामना पूर्ण करूंगा एवं इस सालासर ज्ञान में सदैव निवास करूंगा। ऐसा कहकर श्री बालाजी अन्तर्ध्यान हो गए। तत्पश्चात्‌ भक्त शिरोमणि श्री मोहनदासजी उस गांव के बाहर एक बालू के टीले के ऊपर छोटी सी कुटिया बनाकर उसमें निवास करने लगे और श्री हनुमानजी की भक्ति में मग्न हो गये।

सालासर


ईश्वर का सच्चा भक्त-ईश्वर भक्ति में लीन होने के कारण सांसारिक मोह-माया में नहीं पड़ता और वह कम से कम ही बोलता है। वह अपने मन में ईश्वर की मूर्ति को ही संजोये रहता है, किन्तु सांसारिक गतिविधियों के कारण अनेकों बाधायें आती हैं, एकान्तप्रिय होने के कारण और किसी से न बोलने के कारण भी भक्त-शिरोमणि श्री मोहनदासजी को लोग 'बावलिया' नाम से पुकारने लगे। वे सभी सांसारिक झंझटों से बचने के लिए एक निर्जन स्थान में शमी (जाँटी) वृक्ष के नीचे अपना आसन लगाकर बैठ गये और मौनव्रत का पालन करने लगे।