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सालासर बालाजी का सम्पूर्ण इतिहास

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एक बार की बात है कि इस शमी वृक्ष के नीचे मोहनदासजी धूनी रमाकर तपस्या कर रहे थे, वह वृक्ष फलों से लद गया था। तभी एक दिन -
मोहन कहे मत सोचकर, तू सोच से गिर जाएगा।
कह साँच तुझको कौन भेजा, काज सब सर जाएगा॥
माता नटी मेरे बाप भेजा, तुझे कुण चर जाएगा।
जा बाप को कह साग खा, तू आज ही मर जाएगा॥

सालासर


                उस वृक्ष पर एक जाट का पुत्र चुपचाप चढ कर शमी के फल (सांगरी) तोड ने लगा। डर के कारण घबराहट में कुछ फल मोहनदासजी के ऊपर गिर पड़े जिससे उनका ध्यान भंग हो गया। उन्होंने सोचा कि कहीं कोई पक्षी घायल होकर तो नहीं गिरा और उन्होंने अपनी आँखें खोल दी। जाट का पुत्र भय से काँप उठा। मोहनदासजी ने उसे भयमुक्त करके नीचे आने को कहा। नीचे आने पर उससे पूछा कि तुम यहाँ क्यों आये हो, तुमको किसने भेजा है ? उसने बताया कि माँ के मना करने के बाद भी मेरे पिता ने मुझे यहाँ 'सांगरी' ले आने के लिए विवश किया और यह भी कहा कि तुझे बावलिया से क्या डर, वह तुझे खा थोड़े ही जायेगा ? ऐसा सुनकर भक्त प्रवर ने कहा कि जाकर अपने पिता से कह देना - इन सांगरियों का साग खाने वाला व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता। जनश्रुति के अनुसार उस जाट ने महात्मा मोहनदासजी के द्वारा मना करने के पश्चात्‌ भी वह सांगरी का साग खा लिया और उसकी मृत्यु हो गई। उस जाट को साधु के तिरस्कार का दण्ड मिल गया।
                जनश्रुति के अनुसार आजन्म ब्रह्मचारी भक्त मोहनदासजी के साथ निर्जन स्थान में श्री हनुमानजी महाराज स्वयं बाल-क्रीड़ाये करते थे।
गाँव के सब हार बोले, उदोजी के साथ जी।इस खोज वाला ना मिले, कर जोड़ बोले बात जी॥
मामा तुम्हारा जबर है, जबरां सू घाली बाथजी।
इनकी गति ये ही लखें, न और की कोई औकातजी॥
      एक बार भक्त शिरोमणि के शरीर पर मल्ल-युद्ध के खेल में लगी चोटों को देखकर उनके भानजे उदयराम ने उसके बारे में पूछा, तब मोहनदासजी ने अबोध ग्वालों द्वारा पीटने का बहाना बनाकर उसे टाल दिया, परन्तु उदयराम को इस पर संतोष नहीं हुआ और उन्होंने खोजियों को बुलाकर सारी बात बतायी, उनसे पद-चिन्हों को देखकर रहस्य का पता लगाने को कहा। जब खोजियों ने पैरों के चिन्ह देखे तो उन्हें कोई पद-चिन्ह काफी बड़ा और कोई पद-चिन्ह बहुत छोटा मिला। कहीं-कहीं पर तो वे पद-चिन्ह मिले ही नहीं। अन्ततः पद-चिन्ह अन्वेषक सच्चाई का पता लगाने में पूरी तरह असफल हो गये और वे उदयरामजी से हाथ जोड कर बोले कि ये पद-चिन्ह किसी मनुष्य के नहीं हैं, बल्कि किसी देवता या राक्षस के हैं।
      इस घटना के पश्चात्‌ भक्त शिरोमणि मोहनदासजी के प्रति लोगों के मन में आदर-भाव, सम्मान और आस्था दिनों-दिन बढ ती ही गई।
      सालासर ग्राम भूतपूर्व में बीकानेर राज्य के आधीन था। उस समय ग्रामों के शासन का कार्य ठाकुरों के हाथ में था। सालासर एवं उसके निकट के अनेकों गाँव सौभाग्य देसर (शोभासर) के ठाकुर धीरज सिंह की देख-भाल में थे। उसी समय एक कुख्यात डाकू हजारों घुड सवार साथियों के साथ अत्याचार करता हुआ सालासर के सन्निकट पहुँचा। शाम होने पर वहीं डेरा डालने का विचार करके अपने सहयोगी डाकुओं को पास के गाँव से खाने-पीने का सामान लाने के लिए भेजा और रसद न देने पर लूट-पाट करने की धमकी भी दी।
है एक दिवस की बात, फौज चढ  आई।
सालम सिंह ठाकुर की, अकल चकराई॥
जद मोहनदास, सारों से बात सुणाई।
बजरंग कहे होसी फतेह, डरो मत भाई॥
      उससे आतंकित ठाकुर धीरज सिंह और सालमसिंह भक्त शिरोमणि श्री मोहनदासजी की कुटिया में आये और कहा कि हे महाराज, हम बहुत विपत्ति में हैं। न तो हमारे पास रसद है और न ही सेना। तब मोहनदासजी ने उन्हें आश्वासन दिया  और श्री बालाजी का नाम लेकर दुश्मनकी लाल झण्डी उड़ा देने को कहा क्योंकि संकट मिटाने वाले श्री हनुमानजी ही संकट दूर कर सकते हैं और किसी की भी ध्वजा-पतन का शोक उसकी पराजय ही होती है। साथ ही उन्होंने निर्देश दिया कि डाकुओं के गाँव में प्रवेश करने से पहले ऐसा करें तो गाँव का संकट दूर हो जायेगा,डाकू पैरों में आ गिरेंगे और ठीक वैसा ही हुआ। ठाकुर ने दुश्मन की झण्डी दी और वह डाकू उनके चरणों में गिर  पड़ा । इस घटना के बाद श्री बालाजी के प्रति ठाकुर सालमसिंह की श्रद्धा व भक्ति और बढ  गई, इसी के साथ भक्त-शिरोमणि मोहनदासजी के प्रति विश्वास भी  बढ़ा इस तरह से मोहनदासजी ने अपनी वचनसिद्धि नीति एवं कृपा से इस गाँव की अनेकों बार रक्षा की। उन्होंने कई बार गाँव के निवासियों को तरह-तरह की महामारियों एवं अकालजन्य स्थिति से चमत्कारिक ढंग से छुटकारा भी दिलाया।
परचा मोहन दास का ठाकर देख अपार।
बालाजी स्थापन की लीन्हीं सलाह विचार॥

सालासर


      उचित समय आया हुआ जानकर भक्त-शिरोमणि मोहनदासजी ने श्री हनुमानजी का भव्य मन्दिर बनवाने का संकल्प किया और मूर्ति मंगवाने के निमित्त ठाकुर सालमसिंह ने अपने श्वसुर चम्पावत सरदार जो आसोटा के निवासी थी, को मूर्ति भेजने का सन्देश प्रेषित करवाया।
जब आसोटे हल के ओटे श्रावण में आन प्रकटे हनुमान।
निज भक्त जानके विप्र मोहन की भक्ति लखि उर म्यान॥
संवत्‌ 1899 (सन्‌ 1754 ई.) में प्रातःकाल सूर्योदय के समय नागौर क्षेत्र के आसोटा निवासी एक जाट कृषक जो घटाला गोत्र का था, को अपने खेत में हल जोतते समय हल के फाल से कुछ टकराने की आवाज सुनायी पड़ी और उस समय हल रूक गया। तब उसने उस जगह खुदाई करके देखा तो वहाँ एक मूर्ति थी उसे निकाल लिया, किन्तु प्रमाद के कारण उस मूर्ति की ओर उस जाट किसान ने कोई ध्यान नहीं दिया। थोड़ी  देर पश्चात्‌ उसको पेट में भयंकर  पीड़ा की अनुभूति हुई, जिस कारण वह दर्द से बेहाल होकर एक पेड  की छाँव में सो गया। मध्यान्ह काल में उस जाट किसान ने अपनी पत्नी से सारी कथा बखान की। जाटनी बुद्धिमती थी। अतः उसने अपने आँचल से उस कृष्णमयी पाषाण शिला प्रतिमा को पोंछ-पोंछ कर स्वच्छ किया। तदुपरान्त उसको उस शिला-खण्ड में राम-लक्ष्मण को कन्धे पर लिये हुए भगवान मारूति-नन्दन की दिव्य झांकी के दर्शन हुए। अतः उसने  बड़ी श्रद्धा एवं भक्ति पूर्वक उस प्रतिमा को एक वृक्ष की जड  पर स्थापित कर दिया। इसके पश्चात्‌ पूरी श्रद्धा सहित बाजरे के चूरमे का भोग लगाया और ध्यान में लीन हो गई। तभी मानों चमत्कार ही हुआ, वह जाट किसान जो उदर- पीड़ा से तडप रहा था, स्वस्थ होकर बैठ गया और कृषि कार्य करने लगा।
मूर्ति देख खुशी भये ठाकर, निज महलां में धरी मंगाय।
सुने ठाकर के स्वप्न में जाय कही, माहि सालासर तुरन्त पुगाय॥
अठारा सौ ग्यारोत्तरा, प्रकट भये हनुमान।
मोहनदास पर कृपा कीन्हीं, बणी धोरे पर धाम॥
इस घटना की काफी खयाति फैली। खयाति को सुनकर आसोटा के ठाकुर उक्त मूर्ति के दर्शन की लालसा से वहाँ आये एवं उनके दर्शन करके उक्त मारूति नन्दन की मूर्ति को अपने महल में ले आये। रात में सोते समय ठाकुर को श्री हनुमानजी ने प्रकट होकर दर्शन दिए एवं साथ ही आज्ञा दी कि तुम तत्काल ही इस मर्ति को सालासर पहुँचा दो। भोर हो ही ठाकुर ने हनुमानजी महाराज की आज्ञानुसार अपनी निजी बैलगाड़ी में पाषाण मूर्ति को पधरा कर अपने कुछ निजी कर्मचारियों की सुरक्षा में भजन मण्डली के साथ सालासर के लिये  विदा किया।
                उसी रात में भक्त शिरोमणि मोहनदासजी को भी श्री मारूति-नन्दन के दर्शन प्राप्त हुये। उन्होंने भक्त से कहा कि तुम्हें दिये गये वचन को निभाने के लिये मैं स्वयं काले पत्थर की मर्ति के रूप में आ रहा हूँ, जिसे आसोटा के ठाकुर ने अपनी सुरक्षा में भेजा है। तुम उस मूर्ति को टीले (धोरे)  पर ठाकुर सालम सिंह की उपस्थ्ज्ञिति में उक्त स्थान पर स्थापित करा देना। स्वप्न में प्रभु की आज्ञा पाकर श्री मोहनदासजी ने प्रातःकाल शीघ्र ही नित्यकर्मों से निवृत्त होकर गांव में जाकर सभी ग्रामवासियों को सूचना दी और उनके साथ कीर्तन करते हुए श्री बजरंगबली की पूर्ति की अगवानी हेतु प्रस्थान किया। सभी ग्रामवासी भगवान हनुमानजी की भक्ति में लीन होकर तन्मयता से कीर्तन गाते-नाचते हुए चल पड़े । आगे जाने पर पावोलाव नामक तालाब के निकट भक्त भगवान का अविस्मरणीय मिलन हुआ। इसके उपरान्त उक्त बेलगाडी के बैल अपने आप सालासर के लिए चल पड़े । सालासर पहुँचने पर एक समस्या हुई कि मूर्ति की स्थापना कहाँ की जाए। तब मोहनदासजी महाराज ने कहा कि धोरे पर चलते-चलते जहाँ भी बेल रूक जाये, वहीं स्थान श्री बालाजी की इच्छा का स्वीकृत स्थान होगा। कुछ समय बाद चलते-चलते बैल एक स्थान पर रूक गये। उसी स्थान पर बालाजी की मूर्ति की स्थापना की गयी।
सम्वत्‌ 1799 (ई. सन्‌ 1754) में श्रवण शुक्ल नवमी तिथि को शनिवार के दिन श्री हनुमानजी की मूर्ति की स्थापना हो ही रही थी कि समीपस्थ जूलियासर के ठाकुर जोरावरसिंहजी आ पहुंचे। उनकी पीठ पर अदीठ (दुष्ठ व्रण) बरसों से था, जिसके कष्ट से वे पीड़ित थे। उन्होंने अपने अदीठ के ठीक होने की मनौती मानी और दर्शन करके अपने निवास स्थान पर चले गये। ठाकुर जोरावरसिंह ने डूंगरास ग्राम में परम्परागत स्नान कराते समय नाई को आज्ञा दी की मेरी पीठ पर अदीठ है इसलिये सावधानी पूर्वक धीरे-धीरे नहलाना। नाई ने पीठ पर देखकर कहा कि आपकी पीठ में तो कोई घाव नहीं है, केवल एक चिन्ह है। ऐसा दैव-चमत्कार देखकर ठाकुर साहब अचम्भित रह गये और स्नानादि से निवृत्त बिना भोजन किये ही सालासर आये और यहाँ उपस्थित लोगों से उक्त सारा वृतान्त कह सुनाया। पांच रूपये भेंट भी चढाये   इसके बाद पूजा-सामग्री मंगवाकर श्रद्धा-भक्ति पूर्वक बालाजी भगवान की पूजा-अर्चना की। साथ ही बुँगला (छोटा मन्दिर) भी बनवाने की व्यवस्था की और तत्पश्चात्‌ वहाँ से रवाना होकर अपने ग्राम वापस आ गये।