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सालासर बालाजी का सम्पूर्ण इतिहास

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जगराता की सोमहि बारू। आयउ पुनि सुचि मंगल चारू॥
पलकहि तन मन अति अनुरागा। मोहन मूरति सवारण लागा॥
मंगल मोद उछाह अति नीका। पोता प्रभु कै सेंदुर घी का॥
कन्धे राम लखन बलकारी। भई अदृश्य रेखाकृति सारी॥
सो अब सोचि मनहि-अनुसारी। भावा सो प्रभु रूप संवारी॥
प्रथम दरस जेहि रूपहि कीन्हा। मूंछ दाढि  तस चोलहि दीन्हा॥

सालासर


सम्वत्‌ 1811 श्रावण शुक्ला द्वादशी मंगलवार को भक्त-शिरोमणि श्री मोहनदासजी भगवान का ध्यान करते-करते भक्त्-रिस में इतना सरोबार हो गये कि भाव-विभोर हो उठे। इसी आनन्दातिरेक स्थिति में उन्होंने घी और सिन्दूर का लेपन श्री मारूतिनन्दन की प्रतिमा पर करके उन्हें श्रंगारित किया। उस समय श्री हनुमानजी का पूर्व दर्शित रूप, जिसमें हनुमानजी श्रीराम-लक्ष्मण को अपने कन्धे पर धारण किये हुए थे, वह अदृश्य हो गया। इसके स्थान पर मारूतिनन्दन को जो स्वरूप पसन्द था, दाढ़ी-मूँछ, मस्तक पर तिलक, विकट भौंहे, सुन्दर आँखें, एक हाथ में पर्वत और एक हाथ में गदा धारण किये हुए थे, का दर्शन होने लगा।
                भक्त मोहनदासजी फतेहपुर शेखावाटी के मुसलमान कारीगर नूर मोहम्मद से पूर्व परिचित थे। उन्होंने नूर मोहम्मद को तत्काल सालासर बुलाया। वह बेचारा मुसलमान कारीगर रोजी-रोटी की चिन्ता में परेशान था। इस पर भी फक्कड  भक्तराज ने उस कारीगर को वहाँ बेगार करने के लिए बुला लिया। इस प्रकार से मन में विचार करता हुआ वह कारीगर भक्तराज के पास आ पहुंचा। उसके आते ही मोहनदास ने उसे एक रूपया देकर कहा कि भैया, पहले घर जाओ और घर पर भोजन की व्यवस्था करके आओ, फिर काम करना। यह देखकर वह चकित रह गया और मोहनदासजी से क्षमा याचना करने लगा कि मैं अपने मन में कुविचार लाया था।
                तदोपरान्त संवत्‌ 1814 में सर्वप्रथम नूरा और दाऊ नाम के दो कारीगरों द्वारा मिट्‌टी एवं पत्थर से श्रीबालाजी के मन्दिर का निर्माण कार्य हुआ। कुछ समय पश्चात्‌ सीकर नरेश राजाराव देवीसिंह का पोतदार (रोकडिया) काफी अधिक धन लेकर रामगढ  के लिये जा रहा था। तब बीहड  जंगल के मध्य उस समय के दो  कुख्यात डाकू डूंगजी, जवाहरजी उसे मिल गये। वे बड़े ही दयावान प्रकृति के थे। वे धनवानों से धन छीन कर निर्धन को दे देते थे। गरीबों को वे भूलकर भी नहीं लूटते थे, परन्तु उन्होंने उक्त रोकडि ये को कुछ भी नहीं कहा। यह एक अत्यधिक आश्चर्य की बात थी।
वास्तव में जब डाकुओं ने रोकड़िये को पकड  लिया, तब उसने आर्त-स्वर से श्री बालाजी भगवान से प्रार्थना की और मनौती की कि हे भगवान बालाजी ! मैं मन्दिर बनवाने का संकल्प करता हूँ, मेरी रक्षा करो। तत्पश्चात्‌ ही डाकुओं ने उसे धन सहित छोड  दिया था।
                जब यह आश्चर्यजनक बात पोतदार ने रामगढ  के महाजन को बताकर बालाजी महाराज की असीम अनुकम्पा युक्त महिमा का बखान किया, तब तत्काल ही उन्होंने सिलावट (चेजारा) भिजवाकर संकल्प की पूर्ति की और श्री हनुमानजी का मन्दिर निर्माण कार्य कराया।
                शनैः शनैः मन्दिर विकास कार्य प्रगति की ओर अग्रसर होता रहा और वर्तमान में मन्दिर के किंवाड  व दीवारें चांदी से बनी भव्य मूर्तियों और चित्रों से सुसज्जित हैं, दीवारों में अति सुन्दर दोहे लिखे हुये हैं, जिनके बहुत सुन्दर भावार्थ हैं। इसी तरह गर्भगृह के मुख्य द्वार पर श्रीरामदरबार की मूर्ति के नीचे पांच मूर्तियाँ हैं। मध्य में भक्त मोहनदासजी बैठे हैं। दायें आराध्य श्रीराम एवं हनुमानजी हैं, बायें बहन कान्ही और पं. सुखरामजी  खड़े भक्ति में लगे मोहनदासजी को आशीर्वाद देते हुये दिखाये गये हैं।
                कुछ काल उपरान्त जब सीकर के रावराजा देवीसिंहजी के पुत्र नहीं हुआ, तब वे अपनी जन्मभूमि बलारा गांव (जो सीकर में ही था) चले, वहां से वे एक पुत्र को गोद लेना चाहते थे। मार्ग में ढोलास नाम का एक गांव पडता है। उसी ग्राम के निकट ही भक्तराज मोहनदासजी के गुरु भाई गरीबदासजी कुटिया बनाकर रहते थे। वहीं मार्ग में एक विशाल वृक्ष था, जिसकी शाखा से मार्ग अवरुद्ध था। जब मार्ग में जाते समय सीकर-नरेश को बाधा पड़ी तो उन्होंने अपने वापस लौटने तक उस शाखा को कटवा डालने को कहा, किन्तु लौटने पर उन्होंने देखा कि शाखा उसी प्रकार से मार्ग को अवरूद्ध किये हुए है तो अपने आदेश की अवहेलना पर उन्हें बड़ा क्रोध आया और वह गरीबदासजी को बुरा-भला कहने लगे। तभी गरीबदासजी ने कहा कि 'ले जा तेरे रागडि ये को।' (हाथी के लिए उक्त शब्द को अपमानजनक रूप में प्रयोग किया जाता है)।
बार-बार ऐसा कहने पर राजा नीचे झुककर निकलने लगा तो वृक्ष की शाखा अत्यधिक ऊँची उठ गई। ऐसा अद्‌भुत चमत्कार देखकर देवीसिंह हाथी से उतर पड़ा और प्रणाम करके क्षमा याचना की। गरीबदासजी के क्षमा करने पर उसने पुत्र-प्राप्ति की याचना की, तब स्वामी गरीबदासजी ने पुत्र प्राप्ति हेतु भक्तराज मोहनदासजी के पास सालासर जाने का आदेश दिया।

सालासर


                रावराजा देवीसिंह सीकर आ गये। उसके कुछ दिन बाद ही उनके पोतदार ने डूंगजी-जवाहरजी के द्वारा पकड़े जाने एवं श्रीबालाजी की असीम अनुकम्पा से संकट निवारण होने की घटना कह सुनाई, साथ ही मन्दिर के पूर्ण होने का समाचार भ्ज्ञी कहा।
                राजा देवीसिंह के हृदय में भगवान बालाजी के दर्शन की अभिलाषा तीव्र हुई और वह सालासर पहुंचे तब भक्तप्रवर मोहनदासजी ने उनकी मनोकामना की पूर्ति के लिए श्रीबालाजी को एक श्रीफल (नारियल) अर्पण करने को कहा और उसी श्रीफल को समीपस्थ जाल-वृक्ष में बांधने की आज्ञा दी। श्री मोहनदासजी ने कहा कि राजन, आपके एक सम्बन्धी महोवत सिंह है, जो दुजोद ग्राम में निवास करते हैं, उन्हीं की कन्या से आपको एक पुत्र-रत्न की प्राप्ति होगी, किन्तु दैवयोग से वह पुत्र विकलांग होगा, पर उससे आपके कुल की मान-प्रतिष्ठा बड़ेगी
                भगवान की आज्ञा पाकर रावराजा ने श्री मोहनदासजी से विदा ली और लगभग दस माह पश्चात्‌ उनके यहाँ एक विकलांग पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम लक्ष्मण सिंह रखा गया। कुमार के मुण्डन-संस्कार हेतु संवत 1844 में रावराजा देवी सिंह सपरिवार सालासर आये और मन्दिर के समीप एक महल का निर्माण भी कराया, इसी के साथ ही कुछ भूमि भी प्रदान की।
उक्त घटना के पश्चात्‌ से ही मन्दिर प्रांगण में स्थित जाल-वृक्ष में श्रीफल बांध कर मनोकामना पूर्ण करने की प्रथा चली आ रही है। वर्तमान समय में उक्त जाल-वृक्ष तो नहीं है, पर मन्दिर प्रांगण में अन्य वृक्षों में एवं मन्दिर में मनोकामनार्थ नारियल बांधे जाते हैं। नारियलों की बढ़ती जा रही संखया उक्त स्थान की सिद्धि का बखान कर रही है।
                जनश्रुति के अनुसार एक बार डीडवाना के मुसाहिब को नागौर के राजा ने मौत की सजा का फरमान जारी किया किन्तु उक्त डीडवाना के मुसाहिब ने सालासर के बालाजी महाराज की शरण ले ली। श्री बालाजी की शरणागत्‌ हो जाने के पश्चात्‌ उनकी असीम कृपा एवं भक्तराज मोहनदासजी के शुभ आशीर्वाद से  उन्हें जीवन का अभयदान मिला। राजा ने उसे क्षमा प्रदान की। वह पुनः श्री बालाजी के दर्शनार्थ सालासर आया और प्रभु की सेवा में दस हजार रूपये अर्पण किये। उसके द्वारा मन्दिर में दर्शनार्थियों हेतु मन्दिर प्रांगण के पार्श्व में सात तिबारे बनवाये गये एवं मन्दिर के दक्षिण में तालाब का निर्माण भी हुआ, जिसका शिलान्यास भक्तराज मोहनदासजी ने अपने कर-कमलों से सम्वत्‌ 1848 में किया। प्रमाण स्वरूप 'बोदले तालाब' के निकट स्थित स्तम्भ उत्कीर्ण किया हुआ है -
''रामजी हनुमान जी, समत 1848 तलाब... रीव भ .... मोवन दास महाराज''
                कुछ समय पूर्व १ अक्टूबर सन्‌ 1942 ई. में श्री राजस्थान अकाल सेवा समिति ने इसी तालाब का जीर्णोद्धार करवाया। इस बात का उल्लेख तालाब के उसी स्तम्भ पर अंकित है। उक्त सात तिबारियों में से एक तिबारी अभी भी मन्दिर के दक्षिण पर दृष्टव्य है।
भक्तराज मोहनदासजी ने अपने भानजे उदयराम जी को पूजा-कार्य सौंप दिया और स्वयं धोरे पर स्थित अपनी कुटिया पर निवास करते हुए तपस्यारत्‌ हो गये। एक दिन जब उदयराजजी अपने परिवार सहित घर पर बैठे हुए थे, उन्होंने अपने पुत्र ईसर से मोहरों वाला झावला (मिट्टी का बर्तन) लाने को कहा। सम्भावना है कि पात्र को पहचानने की सुविधा के लिए पात्र का यह नाम ऊपर मोहरों से अंकित होने के कारण रख लिया होगा, किन्तु इस नाम से सुनने वाला बड़ी आसानी से भ्रम में आ सकता है कि मोहरों वाला पात्र अर्थात्‌ पात्र में मोहरें भरी होंगी। विधि के विधान को कौन जान सकता है, किसे ज्ञात था कि यह नाम कितना घातक हो सकता है ? जब उदयरामजी ने ईसर से उक्त पात्र लाने को कहा तो पास ही में एक डाकू केसरसिंह छिपा था, उसके कानों में भी उक्त पात्र का नाम पड़ा । उसने धन-लोभ के वशीभूत होकर उदयरामजी पर आक्रमण करके शस्त्र-प्रहार से उन्हें घायल कर दिया।
                जब परिवारजनों तथा गांव के निवासियों ने उक्त दुर्घटना का ज्ञान हुआ, तब वे साधना में लीन भक्त शिरोमणि मोहनदासजी के निकट गये। पहुंच कर सभी लोगों ने उनसे उक्त घटना का वर्णन करते हुए वहां चलने का निवेदन किया, किन्तु श्री मोहनदासजी ने ना तो घर जाना स्वीकार किया और न ही उस हत्यारे डाकू के पीछे जाकर उससे बदला लेने की कोई इच्छा ही प्रकट की। तब ग्राम के बड़े -बूढ़े लोगों ने उनसे कहा कि तुम तो रूल्याणी से भानजे की रक्षा के वास्ते ही यहाँ आये थे और तुम्हारी स्वर्गवासी बहिन का वही लाडला पुत्र आज लुटेरों द्वारा आहत होकर लगभग मृतप्राय  है, धिक्कार है तुम्हारी भक्ति को ! इस तरह से तमाम बुजुर्गों ने उन्हें बार-बार धिक्कारा। इस प्रकार से बार-बार उत्तेजित करने पर वे उठे और वीर परशुराम की तरह रौद्र रूप में आवेशित हो गए। तत्काल घर पहुँचकर उदयराम की बुरी हालत देखकरद्रवित हो गये और सिंह का रूप धारण करके पाटोदा की ओर दौड़ पड़े । रास्ते में उन्होंने विचार किया कि उन्हें गुरूभाई राघवदास जी मिले तो वे जरूर ही टोकेंगे, अतः मोहनदासजी ने सर्प रूप धारण कर लिया कि सर्प रूप में डाकू को डसकर बदला ले लूंगा। वे कड बी (बाजरे की फसल) के बीच से होकर जाने लगे तो गुरूभाई राघवदासजी ने सामने उपस्थित होकर सर्प वेशधारी मोहनदासजी को रोक दिया और कहने लगे कि ठहरो भैया मोहन, ठहरो, तुम यह क्या करने जा रहे हो ? यह कार्य तुम्हारे जैसे सन्त पुरूषों के लिए नहीं है। आपकी मति भ्रमित हो गई है क्या? तुम तो क्षमादान देने वाले अहिंसा के पुजारी हो। फिर इस प्रकार से क्रोधावेश में क्यों आते हो ? सब कुछ अपने इष्टदेव प्रभु बालाजी महाराज पर छोड कर अपने रूप में वापस आ जाओ। इस तरह से समझाते हुए अपने कमण्डल से शीतल जल छिड ककर मोहनदासजी के क्रोधावेग को शान्त कर दिया।
      तत्पश्चात्‌ दोनों गुरूभ्राता डाकू से मिलने उसके घर गये, किन्तु घर पहुंचने पर उक्त डाकू से भेंट नहीं हुई। डाकू केसरसिंह की मां घर पर थी, उसने कहा कि हे महाराज ! मेरा पुत्र मेरा कहा नहीं सुनता है, मैं तो ऐसे पुत्र की अपेक्षा बांझ रहती तो ठीक था।
      इतना सुनकर भक्त राघवदासजी जो कि आशुकवि भी थे, उन्होंने निकट में खड़े काले नारे अर्थात्‌ काले बैल पर थपकी मारकर पाटोदा ठाकुर सांवल सिंह के पुत्रों के बारे में संकेत किया और कहा कि -
काला नारा कर कड कड़ी लसाँवळ के साताँ न।
मिंदराबाजी खेलसी जद जड़ा मूछ सूँ जाता न॥
इस प्रकार शाप देकर दोनों गुरूभाई वापस अपने घर आ गये वहाँ आने पर उन्हें प्रभु हनुमान जी की महान्‌ कृपा से उदयरामजी पूर्ण रूप से स्वस्थ मिले। इस पर सब लोग आनंदित होकर भक्ति एवं श्रद्धा सहित श्री हनुमानजी की जय-जयकार करते हुए भक्तिभाव से संकीर्तन करने लगे।