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सालासर बालाजी का सम्पूर्ण इतिहास

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कालान्तर में लगातार एकान्तवास करते हुए साधना में ही रत्‌ रहने की प्रबल अभिलाषा के कारण भक्त मोहनदासजी ने अपनेभानजे उदयरामजी को अपना चोला (वस्त्र) प्रदान किया एवं मन्दिर हेतु प्रथम पुजारी के रूप में नियुक्ति की। तब से मोहनदासजी द्वारा दिये गये चोले पर ही विराजमान होकर पूजा की रीति चली आ रही है और वर्तमान में भी है। इसी के साथ जनश्रुति के अनुसार तत्कालीन सौभाग्य देसर (शोभ्ज्ञासर) के ठाकुर धीरजसिंहजी, सालासर के ठाकुर सालमसिंहजी एवं तैतरवाल जाट समुदाय के वयोवृद्धों की उपस्थिति में भूमि आदि सम्बन्धी पट्‌टा की लिखा-पढ़ी की गयी।
                कुछ समय बाद मोहनदासजी ने भूलोक में अपने कर्तव्यों की इतिश्री मानते हुए जीवित अवस्था में समाधि ग्रहण करने की ठान ली। इस अवसर पर समस्त स्थानीय निवासियों, अनेक साधु-सन्तों सहित गुरूभाइयों के साथ श्रीबालाजी भी पधार गये।
                समाधि ग्रहण करने के पूर्व भक्त शिरोमणि मोहनदासजी ने अपने इष्टदेव श्री हनुमानजी से विनती की - हे सखा ! आपसे हाथ जोड कर प्रार्थना करता हूँ कि मेरी बहन कान्ही बाई के लाड ले पुत्र उदयराम को गृहस्थ रहते हुए मन्दिर में पूजन कार्य करते रहने एवं दीर्घायु होने का शुभ आशीर्वाद प्रदान करें।तत्पश्चात्‌ सम्वत्‌ 1850 की वैशाख शुक्ल त्रयोदशी को प्रातःकाल शुभ बेला में भक्त शिरोमणि श्री मोहनदासजी जीवित समाधिस्थ हो गये। समाधि ग्रहण के समय मंद गति से जल की फुहारों के साथ पुष्पों की वर्षा होने लगी थी। मानों मारूतिनन्दन श्री हनुमानजी का आशीष उनके शीश पर समाहित हो रहा हो। दसों दिगन्त स्तब्ध-से रह गये थे इसी के साथ स्वर्गवासी बहन कान्ही बाई का आशीष भी अनुज को मिल रहा था।पं. उदयरामजी पुजारी अपने पूज्य माताजी को अंजुलि भरकर पुष्पों की वर्षा करते हुए पुष्पार्पण कर रहे थे। उपस्थित जन-समुदाय के सौभाग्य का तो कहना ही क्या, जिन्होंने इस दिव्य अलौकिक दृश्य का रसपान अपने चक्षुओं से किया ऐसे कलिकाल में उक्त अलौकिक घटना का होना एवं भक्त शिरोमणि, पवनपुत्र हनुमानजी के सखा तुल्य अर्पित भक्त श्री मोहनदासजी महाराज जैसी शखिसयत का होना स्वयं में एक दैवीय घटना है।

सालासर


      मुखय भवन श्री सालासर - हनुमानजी के मन्दिर की पूर्वी दिशा में 'मोहन चौक' में ही भक्तप्रवर मोहनदासजी महाराज की समाधि का स्मारक-भवन अवस्थित है। इसी के निकट ही लगा हुआ दक्षिण दिशा में उनकी भगिनी कान्ही बाई का स्मारक भी है। आगन्तुक श्रद्धालु भक्तगणों का समुदाय दोनों के चरण-चिन्हों पर शीश नवाकर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है एवं उनका शुभ आशीर्वाद ग्रहण करता है।
      सम्वत्‌ 1842 में ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी दिन शनिवास की शुभबेला में प्रधान पुजारी पण्डित उदयरामजी के द्वारा सर्वप्रथम उक्त छतरियों का निर्माण कार्य द्वार पर एक प्राचीन प्रस्तर-स्तम्भ (कीर्ति-स्मारक) स्थित है, जिसके ऊपर कुछ पंक्तियाँ प्राचीन लिपि में उत्कीर्ण हैं।
      इस समय उक्त स्मारक समाधि स्थल को संगमरमर से सुसज्जित कराकर एक सुन्दर स्वरूप प्रदान करा दिया गया है। इसके निकट ही ऊपर एवं नीचे की मंजिलों में संत-समुदाय के एकाकी निवास के लिए कुटियों का भी निर्माण करा दिया गया है।
      इसी मोहन-मन्दिर में प्रति दिवस प्रातःकालीन एवं संध्याबेला में आरती होती है तथा प्रसाद का वितरण होता है। प्रति वर्ष आश्विन मास में कृष्णा त्रयोदशी को भक्तप्रवर श्री मोहनदासजी महाराज के श्राद्ध को बड़ी धूमधाम से सम्पन्न किया जाता है। इस श्राद्ध के प्रसाद की बड़ी महत्ता है। श्री बालाजी मन्दिर के दक्षिण द्वार पर भक्तप्रवर मोहनदासजी की तपस्या का स्थान है। इसको धूणा कहते हैं। यहाँ पर उसी समय से अखण्ड अग्नि की धूनी जल रही है। इसकी विभूति (भस्म) का  महत्व माना जाता है।
      एक बार सम्वत्‌ 1974 में अतिवृष्टि के कारण धूणे के चारों ओर पानी ही पानी एकत्रित हो गया। तत्कालीन वयोवृद्ध पुजारी लालजी को चिन्ता में देख भक्तप्रवर स्वयं प्रकट होकरबोले-तुम क्यों सोच करते हो ? धूणी की व्यवस्था तो मैं ही करूंगा। उन्होंने बताया कि मैंने इस जाल वृक्ष के कोटर में एक छिद्र कर दिया है, जो मेरी गुफा में जाकर खुलता है। चिन्ता मत करो, पानी उसी में जाने लग गया है।
      पुजारीजी द्वारा कान्ही दादीजी के दर्शनों की इच्छा व्रूक्त की गई, तब उन्होंने कहा कि आगे तुम्हें डर लगेगा, बाई अभ्ज्ञी भजन-पूजन कर रही है। ऐसा कहकर अन्तर्ध्यान हो गये।
      प्रातःकाल आस-पास का जल छिद्र द्वारा गुफा में समा गया। चारों और सूखा स्थान देखकर सभी ने प्रसन्न होकर भक्त एवं भगवान नाम का कीर्तन किया।
धान ओबरै घालद्‌यो गाडो देवो निपाय।
ज्यू चावै ज्यूं काइज्यो थारै कदे निमड़ नाय॥
      'श्री मोहनदासवाणी' की उपरोक्त पंक्तियों एवं जनश्रुति के अनुसार श्री मोहनदासजी के रखे द्वारा हुए दो अनाज भरने के कोठले थे, जिनमें कभी समाप्त न होने वाला अनाज भरा रहता था। इन कोठलों के सम्बन्ध में श्री मोहनदासजी का निर्देश था कि इन्हें खोलकर कभी नहीं देखा जाये, आवश्यकतानुसार नीचे के द्वार से अनाज निकाल कर अवहेलना करने के कारण उन कोठलों की चमत्कारिक शक्ति समाप्त हो गई।
      श्री मोहनदासजी महाराज के समय से मन्दिर में अखण्ड ज्योति (दीप) प्रज्वलित है। मन्दिर में श्री मोहनदासजी महाराज के पहनने के कपड़े भी रखे हुए हैं।
सम्वत्‌ 1860 में लक्ष्मणगढ़ के रहने वाले सेठ रामधन चोखानी की मनोकामना श्री हनुमानजी की कृपा से पूर्ण हुई तो वे अपने पुत्र के संग जात-जडूले के लिए सालासर पधारे। यहाँ आकर उन्होंने मन्दिर को वृहद्‌ रूप में बनवाने का संकल्प किया। जनश्रुति के अनुसार जब कारीगर यहाँ आ गये तो सेठजी ने कारीगरों से श्री बालाजी की मूर्ति इतनी ऊँची स्थापित करने को कहा कि मूर्ति के दर्शन पाँच कोस की दूरी से प्राप्त हो सकें, किन्तु जैसे ही कारीगर मूर्ति को ऊँची करने लगे, अचानक पंखदार भूरे रंगवाले कीड़े -मकोडो  न जाने कहाँ से आकर लोगों को काटने लगे। तब तत्कालीन वयोवृद्ध पुजारी ने कहा किश्रीबालाजी महाराज की इच्छा के विरूद्ध करना उचित नहीं है, सर्व निर्णयानुसार तब उक्त प्रतिमा को यथास्थिति में रहने दिया गया।
सेठ चेजारा पुजारा, सोच सारा सो गया।
रात फाटी छात जहाँ, अध हाथ अन्तर रहो गया।
देख सब राजी भये, मन का सभी दुःख खो गया।
निज छोड  मन्दिर चौतरफ, दहलान दुगुना हो गया॥
                इस घटना चक्र के बारे में विचार-विमर्श करते हुए देर रात्रि में सेठजी, सभी कारीगर एवं पुजारी जी आदि सब वहीं निद्रा-मग्न हो गये। अचानक मध्यरात्रि-बेला में छत बीच से फट गई और लगभग डेढ  फुट चोडी दरार उत्पन्न हो गई। मूल मणि-मन्दिर को छोड कर चारों ओर दालान हो गया। प्रातः यह सब दृश्य अवलोकन करके सभीजन आनन्दित हुये एवचं इसके उपरान्त डालूराम राजगीर के द्वारा मण्डप के चहुँ ओर परिक्रमा, दुछत्ती एवं बरामदा बना दिया गया। इस निर्माण के पश्चात्‌ मन्दिर बड़ा ही सुन्दर एवं विशाल दिखाई देने लगा।
उक्त घटना के पश्चात्‌ लगातार सेठ-साहूकारों द्वारा अपनी मनोवांछित कामना पूर्ण होने पर उत्तरोत्तर मणि-मन्दिर को भव्य रूप प्रदान किया जाता रहा है। केवल इतना ही नहीं मन्दिर के चारों ओर मुसाफिर भक्तों के ठहरने, विश्राम आदि के लिए पर्याप्त रूप से धर्मशालाएं, विश्रामशालाएं आदि निर्मित हैं। मन्दिर के पूर्वी द्वार पर मोहन मन्दिर, मोहन-चौक तथा मोहनदासजी का कूप है। मोहन मन्दिर के सामने ही अबोहर वालों की बड़ी धर्मशालाएं हैं। इसी के साथ दोनों ओर कतारबद्ध भवन अनेकों महाजनों द्वारा निर्मित कराये गये हैं। इन सभी श्रंखलाओं को जोड ने वाले बड़े-बड़े बरामदे व गलियारे हैं। इन बरामदों में अनेकों सुन्दर, धार्मिक तथा नयनाभिराम चित्र बने हुए हैं। इसके दूसरी ओर ब्रह्मपुरी तथा सवामणी आदि के निमित्त विशाल भोज्य-पदार्थ तैयार करने हेतु विशाल कुण्ड एवं रसोवड(रसोई घर) निर्मित हैं।
सालासर धाम के अन्य दर्शनीय स्थल
                श्री मोहनदास जी का धूणा –
यह धूणा श्रीबालाजी के मन्दिर के समीप भक्तप्रवर श्री मोहनदासजी महाराज द्वारा अपने हाथों से प्रज्जवलित किया गया था, जो तब से आज तक अखण्ड बताते हैं। श्रद्धालुजन इस धूणे से भभूती (भस्म) ले जाते हैं और अपने संकट निवारणार्थ उपयोग करते हैं। सच्चे मन से आस्था रखने वाले श्रद्धालुओं को अचूक लाभ होते हुये देखा गया है।
                श्रीसालासर बालाजी के मन्दिर के समीप सामने ही मन्दिर-प्रांगण में श्रीमोहन मन्दिर है। यहाँ श्री मोहनदासजी एवं कानीदादी के चरण-चिन्ह (पगल्या) दर्शनीय हैं। यह दोनों का समाधि-स्मारक है।

                 अंजनी माता का मंदिर-

                 मुख्य मंदिर से लगभग दो किलोमीटर दूर पूर्व दिशा में अंजनी माता का बड़ा ही भव्य मंदिर बना हुआ है, व अधिकतर श्रद्धालू यहाँ माता के दर्शन करने अवश्य आते हैं, तभी उनकी सालासर यात्रा पूर्ण मानी जाती है. माता के मंदिर में कई अन्य छोटे-छोटे मंदिर भी बने हुए हैं.