गणेशजी ॐ नमः शिवाय योगेश्वर श्री शिव
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एक विचार लो . उस विचार को अपना जीवन बना लो - उसके बारे में सोचो उसके सपने देखो , उस विचार को जिवो . अपने मस्तिष्क , मांसपेशियों , नसों , शरीर के हर हिस्से को उस विचार में डूब जाने दो , और बाकी सभी विचारों को किनारे रख दो . यही सफल होने का तरीका है.           ---स्वामी विवेकानन्द

काम वासना

इन्सान का सबसे बड़ा शत्रु है काम. इसी से क्रोध व अन्य दुर्गुण उत्पन्न होते हैं. रचनाकार ने आदमी व औरत इस तरह से बनायें हैं कि दोनों एक दुसरे के प्रति आकर्षित रहतें है. स्रष्टि के चलने के लिए यह आवश्यक भी है. परन्तु इन्सान इसमें उलझा रहकर, इसके वशीभूत होकर अपना जीवन एक साधारण मनुष्य की तरह ही बिता पाता है. अन्दर छुपी हुई शक्तिओं का वह उपयोग नहीं कर सकता है.

बड़े बड़े ऋषि मुनि भी इसके आगे हार मान गए थे, साधारण आदमी की तो बात ही क्या है? कुछ ऐसे सरल रास्ते हमें तलाशने हैं जिनको अपनाकर हम इस पर काबू पा सके. इसके लिए खान-पान, रहन सहन, पहनावा आदि बहुत सारी बातें हैं जिन्हें अपनाकर इसे कम किया जा सकता है. यहाँ मैं एक योगिक तरीका अपनाने की बात करता हूँ.

डेढ़ साल पहले मेरे घर पर एक कुता पाला गया. उस समय वह एक माह का था . मैंने सोचा यह बड़ा होगा तो इसमें काम वासना भी होगी यह क्या करेगा. खैर वह तो पशु है, अन्य पशुओं की तरह बंधा रहेगा. और क्या करेगा?   पिछले 2-3 माह से मुझे अनुभव हुआ की इसमें वह काम भाव जाग गया है, कुछ ऐसी हरकतें वह करने लग गया है जिससे साफ जाहिर होता की इसमें काम भाव पैदा हो गया है. जब इसे कभी खोला जाता है तो यह बाहर भाग जाता है अन्य कुतों के पास. बंधे हुए को कोई कुता दिखता है तो यह भागने की कोशिस करता है. जब इसे कई दिन नहीं खोला गया, फिर मैं उसे घुमाने ले गया. रास्ते में एक जगह वह रुक गया. मैंने उसे रसी से ढीला किया. वह जमीन पर लोटने लगा. लोटते समय वह इस तरह की आवाज करने लगा जैसे अपनी काम वासना को शांत करने का प्रयास कर रहा हो. अब प्रायः वह रोजाना ही इस तरह लेट लेट कर मुहँ से अजीब सी आवाज करते हुए लोटपलेटा करने लगता है. मुझे समझते देर नहीं लगी कि इस तरह से वह अपनी काम भूख मिटा रहा है.

इससे मैंने भी प्रेरणा ली. धरती, पृथ्वी यह तो सबसे बड़ी स्त्री है. इसी पर सभी ओरतें रहती हैं, चलती हैं. इतिहास में भी सभी ओरतों का निवास इस पर रहा है. इस पर पुरुष भी रह रहें है,परन्तु पुरुष को इसे सिर्फ स्त्रीलिंग रूप में ही मानकर इस पर सो जाना चाहिए. जमीन पर कुछ भी बिछाएं व उस पर लेट जाएँ. अनुभव करें की हम माता की गोद में सो गए है. सोचें की हम उस पृथ्वी पर सो रहे हैं, जिस पर सभी सुन्दर स्त्रियाँ निवास करती है,अपने पैरों से इस पर चलकर अपना स्त्रीत्व इसे दे रही हैं,और वही मेरे शरीर में प्राप्त हो राह है.इसे चाहे माता के रूप में सोचे या पत्नी के रूप में. काम को कम करने में यह हमारी जरूर सहायता करती है. वास्तव में ऐसा ही होता है बस मन में भाव वही रखना है.

आकाश को पुरुष का प्रतीक मना गया है, स्त्रियाँ आकाश को अपना सबकुछ मानकर उससे अपनी काम वासना को शांत कर सकती हैं. जमीन पर लेटकर आकाश से वह भाव व संवेदना प्राप्त कर सकती है जो उसे एक पुरुष से प्राप्त होता है. अपने मन को उस समग्र आकाश में समाहित कर दें.

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