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निम्न आसनों में से किसी का भी चुनाव कीजिये-
पद्मासन
मत्स्यासन
पर्वतासन
नौकासन
पश्चिमोत्तनासन
शवासन
सुप्तवज्रासन
वज्रासन
मयूरासन
गोरक्षासन या भद्रासन
योगमुद्रासन
अर्धमत्स्येन्द्रासन

गोरक्षासन या भद्रासन

आसन



विधिः बिछे हुए आसन पर बैठ जायें। दाहिना पैर घुटने से मोड़कर एड़ी सीवन (उपस्थ और गुदा के मध्य) के दाहिने भाग में और बायाँ पैर मोड़कर एड़ी सीवन के बायें भाग में इस प्रकार रखें कि दोनों पैर के तलवे एक दूसरे को लगकर रहें। रेचक करके दोनों हाथ सामने ज़मीन पर टेककर शरीर को ऊपर उठायें और दोनों पैर के पंजों पर इस प्रकार बैठें कि शरीर का वजन एड़ी के मध्य भाग में आये। अंगुलियों वाला भाग छूटा रहे। अब पूरक करते-करते दोनों हाथों की हथेलियों को घुटनों पर रखें। अन्त में कुम्भक करके ठोड़ी छाती पर दबायें। चित्तवृत्ति मूलाधार चक्र में और दृष्टि भी उसी दिशा में लगायें। क्रमशः अभ्यास बढ़ाकर दसके मिनट तक यह आसन करें। ध्यान मूलाधार चक्र में। श्वास प्रथम स्थिति में पूरक और दूसरी स्थिति में कुम्भक।
लाभः इस आसन के अभ्यास से पैर के सब सन्धि स्थान तथा स्नायु सशक्त बनते हैं। वायु ऊर्ध्वगामी होकर जठराग्नि प्रदीप्त करता है। दिनों दिन जड़ता नष्ट होने लगती है। शरीर पतला होता है। संकल्पबल बढ़ता है। बुद्धि तीक्षण होती है। कल्पनाशक्ति का विकास होता है। प्राणापान की एकता होती है। नादोत्पत्ति होने लगती है। बिन्दु स्थिर होकर चित्त की चंचलता कम होती है। आहार का संपूर्णतया पाचन हो जाने के कारण मलमूत्र अल्प होने लगते हैं। शरीर शुद्धि होने लगती है। तन में स्फूर्ति एवं मन में प्रसन्नता अपने आप प्रकट होती है। स्नायु सुदृढ़ बनते हैं।