भारत चीन

अभी हाल ही मै चीन और भारत के बिच डाँग ला को लेके दोनों देशो के सेनाये आमने सामने आगई हैI चीन हमेशा से ही अपनी शक्ति प्रदर्शन को लेके अग्रसर रहता है और वो ऐसा कोही भी मौका नहीं छोड़ता जिसमे वो अपनी सैनिक शक्ति ना दिखानी पड़े l पर चीन ने जो भारतीय सेना पे टिपण्णी जो की है उसको लेके मै थोड़ा संदेह में हुl चीन ने कहा की भारत अपने इतिहास से सबक ले और सोच समझ के ही कोई कदम उठाए l शायद चीन अपना इतिहास पढना भूल गया l वो भूल गया की “कैसे भारतीय सेना ने 1967 में नाथू ला और चो ला की लड़ाई में चीनी आर्मी को धुल चटाई थी I

ये तो सभी को पता है की भारत चीन से 1962 का युद्ध हार (युद्धविराम ) गया था I हाँ ये एक हार थी पर ये हार जवाहरलाल नेहरु की राजनेतिक नेतृत्व और उनके चुने हुए समबन्धित अधिकारियो के कारण हुई थी, नाकि हमारी सेना के कारण जो की सैन्यशक्ति और सैन्यबल में कमजोर होने के बावजूद शेरो की तरह लड़ी थी I

दो साल बाद , नेहरु जी का देहांत हो गया, परन्तु चीन के द्वारा भारत की हार को भुलाया ना जा सका I इसके बाद एक नयी भारतीय सेना का जन्म हुआ जो पहले से काफी ज्यादा आक्रमणशील थी , नतीजा भारत ने 1965 की लड़ाई को पाकिस्तान को पराजित किया

फिर भी चीन ये ही सोचता रहा की क्युकी उन्होंने भारत को 1962 में में हराया था , तो हम भारतीय कभी भी चीन की सैन्य शक्ति का मुकाबला नहीं कर पायेंगे

इसके पश्चात् युधकारी चीनियों ने भारत से नाथुला की मांग की , जो की आज सिक्किम में भारत तिब्बत सीमा के पास एक बहुत प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है I तब भारतीय सेना ने क्या जवाब दिया ?

नाथुला ही क्यों ?

नाथुला कुटनीतिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण दर्रा है जोकि स्मुन्द्रतल से 14,200 फिट की उचाई पे स्थित है I उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह थी की सिक्किम उस समय भारत का हिस्सा नहीं था I सिक्किम उस समय एक सरंक्षित राज्य था जिसका अर्थ ये हुआ की भारतीय सेना की ये जिम्मेदारी थी की वो सिक्किम की शत्रु सेनाओ के आक्रमण से रक्षा करे I

चीन चाहता था की भारतीय सेनाये सिक्किम से हट जाए और वो उसपे कब्ज़ा कर बैठे l जरा कल्पना कीजिये की क्या होता की अगर भारत एसा करने देता तब चीन की सीमा पश्चिम बंगाल तक पहुच जाती और मुमकिन था की उत्तरपूर्व के राज्य भी भारत के अभिन्न अंग न रह पाते l

उस समय मेज. जन. सागतसिंह भारतीय सेना के पर्वतीय मंडल के GOC थे : लेट. जन. जगजीत सिंह अरोरा कोर्प्स कमानडर थे और लेट. जन (जो बादमे फील्ड मार्शल बने ) सैम मानिकशा पूर्वी सेना के कमानडर थे I ये वो ही तीन हस्तियाँ है जिन्होंने 1971 की लड़ाई का इतिहास लिखा था

भारतीय सेना ने सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सेबू ला और कैमल्स बैक जहां से पुरे नाथू ला को ऊपर से देखा जा सकता है साथ ही चीनियों पे सामरिक लाभ पहुचता है I चूँकि “ बड़े भाई” का मिथक जो की नेहरु द्वारा बनाया गया था वो 1962 टूट चूका था I भारतीय सेनाओ ने इन दो उचाईयो पे तोपे स्थापित की ताकि चीनी सेना अगर कोई कदम उठाये तो उसका जवाब दे सके l बादमे ये उठाया गया कदम बहुत ही निर्णायक साबित हुआ l

चूँकि भारतीय सेना और चीनी सेना आमने सामने सीमा की निघ्रानी करते थे , छुट पूत झगडा होना आम बात थी l उससे बचाव के लिए , भारतीय सेना ने अपनी सीमा पर तार की बाड़ लगाने का निर्णय लिया l यह काम 11सितम्बर 1967. की सुबह करना था

11सितम्बर 1967. की सुबह

भारतीय सेना के इनजिनियेर्स 18 राजपूत द्वारा सरंक्षित थी l 2 ग्रेनेडियर को सेबू ला और कैमल्स बैक पर तैनात किया हुआ था जो की अलर्ट थी l

मेज.जन शेरू थपलियाल के निजी वक्तविय के अनुसार , जो की उस समय वहाँ पे एक जवान ऑफिसर थे , चीनी आर्मी की एक यूनिट दर्रे के बीच में आई और तार नहीं बिछाने की मांग करने लगी l अपने जवान बिना किसी शिकन के तार बिछाते रहे I

गुस्से में , चीनी अपने बंकर में वापस चले गए l ये माने जाने लगा की उनको अपना जवाब मिल गया और इस मुद्दे को राजनितिक रूप से उठाया जायेगा l लेकिन येही पे चीनि सेना ने अपना असली रंग दिखा दिया l
चीनियों ने बिना किसी चेतावनी के भारतीयों जवानों पर गोलियां चलानी शुरू करदी , वो जवान जो की याक ला पे इनजिनियेर्स को संक्रक्षण प्रदान कर रहे थे l

चूँकि इतनी उचाई पे कोई भी कवर नहीं था , भारतीय जवान गोलीबारी में फास गए l लेट .कल
सिंह , 2 ग्रेनेडिएर के CO , बुरी तरह ज़ख़्मी हो गए पर फिर भी लड़ते रहे , कप्तैन डागर ( 2 ग्रेनेडिएर) और मेज. हरभजन सिंह ( 18 राजपूत ) सहस के साथ दुश्मनों की गोलियों का जवाब देते हुए शहीद होगयेl

कैप्टेन डागर को को जहां मरणोपरांत वीर चक्र प्रदान किया गया वहीँ मेज. हरभजन सिंह को मरणोपरांत महा वीर चक्र और लेट .कल राए सिंह को MVC

शायद चीनी 1962 की जीत के माशे में चूर थे , चीनियों ने कुछ ज्यादा ही भारतीय सेना को कम आंकलिया था l

भारतीय सेना ने सेबू ला और कैमल बैक से गोलाबारी शुरू की l गोलाबारी इतनी सटीक थी की लगभग चीनियों के सारे बंकर नष्ट हो गए थे l

गोलाबारी सितम्बर 14 तक चलती रही , चीनी सेना इतनी ज्यादा तबाह हो गयी की उन्होंने अपनी वायु सेना के प्रयोग का खौफ दीखाने लगे l पर उस समय वो कुछ न कर पाए , भारतीय सेना ने युध्विराम सितम्बर 15 स्वीकार कर लिया l

अंत में नाथुला कांड का नतीजा यह रहा :
भारतीय सेना : 70 शहीद
चीनी सेना : 300 से अधिक हलाक

1अक्टूबर , 1967 :छो ला

1 9 67 में, हालांकि, चीनी बहुत अभिमानी थे कम से कम चीनी राजनीतिक प्रतिष्ठान काफी उचाईयो पे था , लेकिन उस समय हमारे युद्ध के घाव ताजा थे

नाथु ला घटना ने भारत को सिक्किम में अपनी सुरक्षा को बढ़ा दिया था, जबकि चीन नेथु ला में भारतीय सेना को अपमानित करने की नयी योजना बनाने लगा ।

नाथु ला में घुसपैठ के बाद, भारत ने नाथू ला पास के उत्तर में चो ला पास के साथ नवगठित 7/11 गोरखा रेजिमेंट को तैनात किया।

1 अक्टूबर को, एक चीनी प्लाटून ने जानबूझकर एक फॉरवर्ड प्लाटून कमांडर नाइब सुबेदार ज्ञान बहादुर लिम्बु को बयोनेट से जान से मार दिया किया। लेकिन चीनी भूल गए कि वे गोरखाओं का सामना कर रहे थे, दुनिया में निर्विवाद रूप से सबसे साहसी योद्धा थे।

लिम्बु के जवानों ने अपने सैनिकों को मारने वाले चीनी सैनिको से बदला लिया और उस सैनिक का हाथ काट दिया जिसने उनके सूबेदार को मारा था l यह जल्दी से एक भयंकर गनबैटल में बढ़ गया जो अगले 10 दिनों तक जारी रहा।

भारत ने कुछ बहादुर सैनिकों को खो दिया था लेकिन चो ला पास के पीछे तीन किलोमीटर की दूरी तक चीनी सैनिको को खदेड़ दिया था l दो सैनिकों, राइफलमैन देवी प्रसाद लिम्बु और हवालर टिनजोंग लामा को वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

नथु ला और चो ला की घटनाओं में भारतीयों की कुल संख्या 88 है जबकि 163 घायल हो गए हैं। चीन ने लगभग 400 सैनिकों को खो दिया और 450 घायल हो गए।

एक असहज सन्नाटा ?

चीन ने कभी भी नथु ला में भारतीयों सेना से भिड़ने की हिम्मत नहीं की है या फिर कहीं भी भारत-चीन सीमा पर, और यहां तक ​​कि अगर वे (लद्दाख में भी दुबारा एसा करते, तो वे जल्दी ही भारतीय सेना द्वारा खदेड़ दिए जाते l

नाथु ला तब से शांतिपूर्ण रहा है और अब यह एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। सीमा पर स्थित एक झोपड़ी है जहां चीन और भारतीय उपहारों का आदान प्रदान करते हैl

“भारत चीन” पर एक उत्तर

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