मायका

“मायका”
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गर्मी की छुट्टियों में सुमन मायके आयी और बाहें फैलाकर एक लंबी साँस लेकर बोली वाह मां……यहां आते ही एक सुकून सा मिलता है….
………..जैसे जी भर के खुली हवा में साँस लेने को मिलती है मां……. दिलो दिमाग से एक वज़न सा हट जाता है….और वहां बस सारा दिन देवेश मुझे टोकते रहते हैं थोड़ा धीरे बोलो, तेज़ आवाज़ में मत हँसो….पापा सुन लेंगे….किचन में काम करते करते गुनगुनाने पर भी प्रतिबंध…..
और तो और वहाँ तो ऐसी गर्मी में भी बस साडी ही पहनो और यहां ……न पहनने का कोई प्रतिबन्ध….. न खाने का…. यहीं आकर लगता है कि हाँ अब वो जिंदगी जी रहे हैं जो जीना चाहते हैं….
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फिर ज़रा रुकते हुए वो गले का थूक गटकते हुए थोड़ा भावुक होकर बोली ‘मां ज्यादा कुछ तो नहीं चाहा था न मैंने?…..पर छोटी छोटी खुशियों को भी तरस जाती हूँ वहाँ….बस हर वक़्त फालतू की रोक टोक, ढंग से किये गए काम में भी जबर्दस्ती की नुक्ताचीनी करना ये मेरी सासु जी की आदत बन चुकी है बस कमियां निकालकर मेरी शिकायतें देवेश से किया करतीं हैं और स्नेह के नाम पर दो मीठे शब्द उनके मुंह से कभी नहीं निकले मेरे लिए।
…………पर यहां आकर लगता है कोई सच में हमारी परवाह करता है।
पता है मां ? बहुत याद आती है आपकी जब मैं बीमार होती हूँ तो …..जब यहां सर दर्द होता है तो आप सिरहाने बैठ कर सर दबाती है,कहती हो आ तेरे सर में घी मसल दूँ दर्द कम हो जायेगा….और वहां तो जैसे किसी को फर्क ही नहीं पड़ता कि मुझे बुखार है या सर दर्द बस अपना काम चाहिए उन्हें तो…..बुखार में भी किचन में ही लगी रहती हूँ सासु जी तो आराम करने तक की नहीं कहती ….हाँ देवेश जरूर कहते हैं….पर वो भी उनकी माँ की नाराज़गी के कारण ज्यादा कुछ नहीं बोलते…..
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मां ….भाभी कहाँ है?……..यहीं है !
सो रही है महारानी अभी तक…..’अरी कुसुम उठ और जाकर चाय बना दे, देख सुमन कब की आयी है और तुझे कोई होश ही नहीं,घोड़े बेच कर सो रही है जैसे…..
भाभी….भाभी….
‘हाँ सुमन दीदी…. आयी…. अरे सॉरी मुझे तो पता ही नहीं चला आप कब आयी ज़रा सी आंख लग गयी थी’..’.मैं अभी चाय बनाती हूँ आप बैठो’…
अरे भाभी ! आपको तो बुखार है !
भैया भाभी को हॉस्पिटल दिखा कर लाओ उन्हें बुखार है।
मां चाय मैं ही बना कर पी लेती हूँ।
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“अरे गोली ले लेगी यहीं ,हो जायेगा ठीक…
हम तो इसकी उम्र में कितना काम करते थे बुखार वगैरह की तो कभी परवाह ही नहीं की” सुमन की मां बोल उठी……
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‘नहीं मां’……ये तो इस घर की धुरी हैं….इनकी वैसी ही परवाह करोगी जैसी मेरी करती हो तो ये घर सुखी और सधा हुआ रहेगा।…….सुमन ये बोलती हुई चाय बनाने चल दी।
इधर …… कुसुम की आँखों में सुमन के लिए श्रद्धा के भाव आंसू बन कर टपक पड़े।

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