इस्टालीन

जोज़फ इस्टालिन एक बार अपने साथ संसद में एक मुर्गा लेकर आये,

और सबके सामने उसका एक-एक पंख नोचने लगे,

मुर्गा दर्द से बिलबिलाता रहा मगर,

एक-एक करके इस्टालिन ने सारे पंख नोच दिये,

फिर मुर्गे को फर्श पर फेंक दिया,

फिर जेब से कुछ दाने निकालकर मुर्गे की तरफ फेंक दिए और चलने लगा,

तो मुर्गा दाना खाता हुआ इस्टालिन के पीछे चलने लगा,

इस्टालिन बराबर दाना फेंकता गया और मुर्गा बराबर दाना मु्ँह में ड़ालता हुआ उसके पीछे चलता रहा।

आखिरकार वो मुर्गा इस्टालिन के पैरों में आ खड़ा हुआ।

इस्टालिन स्पीकर की तरफ देखा और एक तारीख़ी जुमला बोला,

“लोकतांत्रिक देशों की जनता इस मुर्गे की तरह होती है,

उनके हुकमरान जनता का पहले सब कुछ लूट कर उन्हें अपाहिज कर देते हैं,

और बाद में उन्हें थोड़ी सी खुराक देकर उनका मसीहा बन जाते हैं.

संगठन

👌 शानदार बात👌

झाड़ू जब तक एक सूत्र में बँधी होती है, तब तक वह “कचरा” साफ करती है।

लेकिन वही झाड़ू जब बिखर जाती है, तो खुद कचरा हो जाती है।

इस लिये, हमेशा संगठन से बंधे रहें , बिखर कर कचरा न बनें।

नमस्कार

🌻🌻🌻🌻🌻
*नेक लोगों की संगत से*
*हमेशा भलाई ही मिलती हे,*
*क्योंकि….*
*हवा जब फूलो से गुज़रती हे,*
*तो वो भी खुश्बुदार हो जाती हे.*
*🌞शुभ प्रभात🌞*
🍁🍁🍁🍁

अधिकारी

एक राजा था। उसने दस खूंखार जंगली कुत्ते पाल रखे थे।

उसके दरबारियों और मंत्रियों से जब कोई मामूली सी भी गलती हो जाती तो वह उन्हें उन कुत्तों को ही खिला देता।

एक बार उसके एक विश्वासपात्र सेवक से एक छोटी सी भूल हो गयी,

राजा ने उसे भी उन्हीं कुत्तों के सामने डालने का हुक्म सुना दिया।

उस सेवक ने उसे अपने दस साल की सेवा का वास्ता दिया,

मगर राजा ने उसकी एक न सुनी।

फिर उसने अपने लिए दस दिन की मोहलत माँगी जो उसे मिल गयी।

अब वह आदमी उन कुत्तों के रखवाले और सेवक के पास गया

और उससे विनती की कि वह उसे दस दिन के लिए अपने साथ काम करने का अवसर दे।

किस्मत उसके साथ थी, उस रखवाले ने उसे अपने साथ रख लिया।

दस दिनों तक उसने उन कुत्तों को खिलाया, पिलाया, नहलाया, सहलाया और खूब सेवा की।

आखिर फैसले वाले दिन राजा ने जब उसे उन कुत्तों के सामने फेंकवा दिया तो वे उसे चाटने लगे, उसके सामने दुम हिलाने और लोटने लगे।

राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ।

उसके पूछने पर उस आदमी ने बताया कि महाराज इन कुत्तों ने मेरी मात्र दस दिन की सेवा का इतना मान दिया

बस महाराज ने वर्षों की सेवा को एक छोटी सी भूल पर भुला दिया।

राजा को अपनी गलती का अहसास हो गया।

और उसने उस आदमी को तुरंत

.. .

भूखे मगरमच्छों के सामने डलवा दिया।

सीख:- आखिरी फैसला अधिकारियों का ही होता है उसपर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता…

सरकारी कर्मचारियों को समर्पित😃😃😃😃👌👌😃😃😊

मायका

“मायका”
*
गर्मी की छुट्टियों में सुमन मायके आयी और बाहें फैलाकर एक लंबी साँस लेकर बोली वाह मां……यहां आते ही एक सुकून सा मिलता है….
………..जैसे जी भर के खुली हवा में साँस लेने को मिलती है मां……. दिलो दिमाग से एक वज़न सा हट जाता है….और वहां बस सारा दिन देवेश मुझे टोकते रहते हैं थोड़ा धीरे बोलो, तेज़ आवाज़ में मत हँसो….पापा सुन लेंगे….किचन में काम करते करते गुनगुनाने पर भी प्रतिबंध…..
और तो और वहाँ तो ऐसी गर्मी में भी बस साडी ही पहनो और यहां ……न पहनने का कोई प्रतिबन्ध….. न खाने का…. यहीं आकर लगता है कि हाँ अब वो जिंदगी जी रहे हैं जो जीना चाहते हैं….
*
फिर ज़रा रुकते हुए वो गले का थूक गटकते हुए थोड़ा भावुक होकर बोली ‘मां ज्यादा कुछ तो नहीं चाहा था न मैंने?…..पर छोटी छोटी खुशियों को भी तरस जाती हूँ वहाँ….बस हर वक़्त फालतू की रोक टोक, ढंग से किये गए काम में भी जबर्दस्ती की नुक्ताचीनी करना ये मेरी सासु जी की आदत बन चुकी है बस कमियां निकालकर मेरी शिकायतें देवेश से किया करतीं हैं और स्नेह के नाम पर दो मीठे शब्द उनके मुंह से कभी नहीं निकले मेरे लिए।
…………पर यहां आकर लगता है कोई सच में हमारी परवाह करता है।
पता है मां ? बहुत याद आती है आपकी जब मैं बीमार होती हूँ तो …..जब यहां सर दर्द होता है तो आप सिरहाने बैठ कर सर दबाती है,कहती हो आ तेरे सर में घी मसल दूँ दर्द कम हो जायेगा….और वहां तो जैसे किसी को फर्क ही नहीं पड़ता कि मुझे बुखार है या सर दर्द बस अपना काम चाहिए उन्हें तो…..बुखार में भी किचन में ही लगी रहती हूँ सासु जी तो आराम करने तक की नहीं कहती ….हाँ देवेश जरूर कहते हैं….पर वो भी उनकी माँ की नाराज़गी के कारण ज्यादा कुछ नहीं बोलते…..
*
मां ….भाभी कहाँ है?……..यहीं है !
सो रही है महारानी अभी तक…..’अरी कुसुम उठ और जाकर चाय बना दे, देख सुमन कब की आयी है और तुझे कोई होश ही नहीं,घोड़े बेच कर सो रही है जैसे…..
भाभी….भाभी….
‘हाँ सुमन दीदी…. आयी…. अरे सॉरी मुझे तो पता ही नहीं चला आप कब आयी ज़रा सी आंख लग गयी थी’..’.मैं अभी चाय बनाती हूँ आप बैठो’…
अरे भाभी ! आपको तो बुखार है !
भैया भाभी को हॉस्पिटल दिखा कर लाओ उन्हें बुखार है।
मां चाय मैं ही बना कर पी लेती हूँ।
*
“अरे गोली ले लेगी यहीं ,हो जायेगा ठीक…
हम तो इसकी उम्र में कितना काम करते थे बुखार वगैरह की तो कभी परवाह ही नहीं की” सुमन की मां बोल उठी……
*
‘नहीं मां’……ये तो इस घर की धुरी हैं….इनकी वैसी ही परवाह करोगी जैसी मेरी करती हो तो ये घर सुखी और सधा हुआ रहेगा।…….सुमन ये बोलती हुई चाय बनाने चल दी।
इधर …… कुसुम की आँखों में सुमन के लिए श्रद्धा के भाव आंसू बन कर टपक पड़े।

चीन की चाल

*बिना एक गोली चलाये जीत जाएगा चीन*

टाइटल पर यकीन नही होगा , लेकिन पूरा लेख पढ़ने के बाद आंखे चौड़ी नही होंगी बल्कि फट जाएंगी।

*चीन की थ्योरी क्या है*
युद्ध की स्तिथि में किसी भी देश का पूरा ध्यान सीमा की सुरक्षा पर रहता है, और अगर उस देश के अंदर भीषण पैमाने पर अराजकता, नागरिकों को असुरक्षित या जान का नुकसान पहुचाया जाए तो किसी भी देश की सरकार प्राथमिकता पहले आंतरिक सुरक्षा और जान माल के नुकसान को रोकने की होती है। इसी थ्योरी पर कई साल पहले से ही चीन काम कर चुका है।
*हुआ कब*
वास्तव में चीन ने इसकी तैयारी 4-5 साल पहले शुरू कर दी थी, जब उसने मिसाइल से उपग्रह को सफलतापूर्वक नष्ट करने की क्षमता हासिल कर ली थी। उस मिशन की सफलता पार्टी चल रही थी और पार्टी के दौरान चीनी एक गुप्त मीटिंग में राष्ट्रपति, अत्यंत वरिष्ठ रक्षा विशेषज्ञ , वित्त मंत्री एक मिशन की रूपरेखा बना रहे थे कि बिना लड़े ही युद्ध कैसे जीत जा सकता है। इस मिशन का प्रारम्भिक बजट 9 खरब
(900 अरब ) रुपये रखा गया।
*मिशन क्या है*
इस मिशन का उद्देश्य उपग्रह द्वारा संचार तरंगों द्वारा भेजकर किसी विस्फोटक को नियंत्रित और उसमें विस्फोट कराने की क्षमता और तकनीक विकसित करना था, इस तकनीक को चीन ने करीब 2 साल में डेवलप कर लिया था।
*तकनीक का इस्तेमाल कैसे होगा*
इस तकनीक का इस्तेमाल में 2 महत्वपूर्ण चीजें हैँ, पहला विस्फोटक और दूसरा उसका उपग्रह से सतत संपर्क।
काफी बड़े पैमाने पर उपग्रह या संचार तरंगों के संपर्क में रहने वाली एक ही चीज है वो है मोबाइल।
चीन ने मोबाइल की बैटरी में कुछ खुफिया रसायनों का इस्तेमाल किया है और मोबाइल सीक्रेट प्रोग्राम फीड किया है जो कि एक विशेष निर्देश मिलने पर बैटरी को ब्लास्ट कर देगा।
*चीनी रणनीति*
तकनीक को सफलतापूर्वक विकसित करने के बाद चीन दबाव और लालच देकर मोबाइल निर्माता कंपनियों के मालिकों को मिलाकर इस तकनीक को मोबाइल में डाल के बेच रहा है। जितना ज्यादा mAh की बैटरी उतना ही घातक विस्फोटक प्रभाव।
*आक्रामक बिक्री*
इस रणनीति के तहत चीन की योजना दूसरे देशों में ज्यादा से ज्यादा मोबाइल बेचने की है , ताकि कभी भी बहुत ही ज्यादा पैमाने पर नागरिकों को नुकसान पहुचाया जा सके।
जो high end मोबाइल Samsung, Apple और LG जैसी कंपनियां 25- 30 हजार में दे रही है वो मोबाइल चीनी कंपनियां मात्र 8-10 हजार में इसलिए नही दे रही हैं कि वो बहुत कम मुनाफा कमा रही हैं बल्कि इसलिए दे रही हैं कि उनको चीनी सरकार बहुत तगड़ा पैसा दे रही है।
*रणनीतिक और युद्ध की स्तिथि में प्रभाव*
अब इसके व्यापक प्रभाव पर नजर डालिए। पिछले 3 साल से चीनी कम्पनियो ने सस्ते दाम पर करीब 2 करोड़ मोबाइल भारतीयों की जेब मे डाल दिये हैं। जो उपग्रह संचार से चीनी खुफिया उच्च कार्यालय की निगरानी में हैं।
एक निर्देश देकर चीन 2 करोड़ विस्फोट भारत मे करने की क्षमता पा चुका है। आप खुद सोचिये की चीनी कम्पनियों के सबसे ज्यादा फोकस मोबाइल ही बेचने पर क्यो है ? वो TV , फ्रिज या वासिंग मशीन बेचने पर ज्यादा ध्यान क्यो नही दे रही हैं ? क्योकि उनपर निरंतर संचार उपग्रह से नियंत्रण असम्भव ही है।

अब अगर भारत और चीन का युद्ध होगा और चीन ने मोबाइल्स को विस्फ़ोट कर दिया तो करीब 2 करोड़ लोग घायल हो जाएंगे, और कई मृत्यु भी होंगी।
इतनी बड़ी संख्या में एक साथ कोई भी देश युद्ध के आपातकाल तो क्या नार्मल समय मे भी चिकित्सा सुविधा नही दे पायेगा। इस स्तिथि में देश के नागरिक अराजकता पर आ जाएंगे और सरकार को आंतरिक सुरक्षा और देश की सीमा सुरक्षा की भारी जिम्मेदारी एक साथ आएगी । बाहरी दुश्मन को मारना आसान है पर अपने ही घायल, पीड़ित और उपद्रवी नागरिकों पर सरकार कैसे नियंत्रण कर पायेगी ? इस दोहरे युद्ध मे पहले देश हारेगा फिर नागरिक चीनी गुलाम बन जाएंगे।
अब भी आपको शायद यकीन नही आएगा, शायद अब यकीन आ जाये
3 साल पहले से ही हमेशा चीन में ही निर्मित या असेंबल्ड मोबाइल्स में विस्फोट क्यो हो रहे हैं और कोई भी मोबाइल चीन में क्यो नही फटता है ?
वास्तव में समय समय पर चीन अपने नियंत्रण सिस्टम को चेक करने के लिए कुछ अत्यंत सीमित निर्देश संचारित करता है, जो मोबाइल में विस्फोट के करते हैं।

*क्या चीन ऐसा कर सकता है*
बेशक ।
वो देश जो अपने ही नागरिकों टैंक से भी उड़वा सकता है, वो दुश्मन देश के नागरिकों को अपना हथियार बनाने से भला क्यों पीछे हटने लगा।
ये राज हमेशा राज ही रहता अगर एक उच्च चीनी रक्षा अधिकारी ने नशे की हालत में एक अपनी एक महिला मित्र को उगला न होता, वास्तव में वो महिला चीन विरोधी देश के एक सीक्रेट जासूसी मिशन पर थी।

*अब करना क्या है*
ये आप पर और बच्चों के पालकों पर निर्भर करता है कि उनको करना क्या है।
अपने विवेक का अच्छे से इस्तेमाल करके सोचिये, लोगो से चर्चा कीजिये और उचित निर्णय लीजिये ।

वामन देव

वामन विष्णु के पाँचवे तथा त्रेता युग के पहले अवतार थे। इसके साथ ही यह विष्णु के पहले ऐसे अवतार थे जो मानव रूप में प्रकट हुए — अलबत्ता बौने ब्राह्मण के रूप में। इनको दक्षिण भारत में उपेन्द्र के नाम से भी जाना जाता है।

वामन ॠषि कश्यप तथा उनकी पत्नी अदिति के पुत्र थे।वह आदित्यों में बारहवें थे। ऐसी मान्यता है कि वह इन्द्र के छोटे भाई थे।

भागवत कथा के अनुसार विष्णु ने इन्द्र का देवलोक में अधिकार पुनः स्थापित करने के लिए यह अवतार लिया। देवलोक असुर राजा बली ने हड़प लिया था। बली विरोचन के पुत्र तथा प्रह्लाद के पौत्र थे और एक दयालु असुर राजा के रूप में जाने जाते थे। यह भी कहा जाता है कि अपनी तपस्या तथा ताक़त के माध्यम से बली ने त्रिलोक पर आधिपत्य हासिल कर लिया था।[2] वामन, एक बौने ब्राह्मण के वेष में बली के पास गये और उनसे अपने रहने के लिए तीन कदम के बराबर भूमि देने का आग्रह किया। उनके हाथ में एक लकड़ी का छाता था। गुरु शुक्राचार्य के चेताने के बावजूद बली ने वामन को वचन दे डाला।
वामन ने अपना आकार इतना बढ़ा लिया कि पहले ही कदम में पूरा भूलोक (पृथ्वी) नाप लिया। दूसरे कदम में देवलोक नाप लिया। इसके पश्चात् ब्रह्मा ने अपने कमण्डल के जल से वामन के पाँव धोये। इसी जल से गंगा उत्पन्न हुयीं।तीसरे कदम के लिए कोई भूमि बची ही नहीं। वचन के पक्के बली ने तब वामन को तीसरा कदम रखने के लिए अपना सिर प्रस्तुत कर दिया। वामन बली की वचनबद्धता से अति प्रसन्न हुये। चूँकि बली के दादा प्रह्लाद विष्णु के परम् भक्त थे, वामन (विष्णु) ने बाली को पाताल लोक देने का निश्चय किया और अपना तीसरा कदम बाली के सिर में रखा जिसके फलस्वरूप बली पाताल लोक में पहुँच गये।
एक और कथा के अनुसार वामन ने बली के सिर पर अपना पैर रखकर उनको अमरत्व प्रदान कर दिया।विष्णु अपने विराट रूप में प्रकट हुये और राजा को महाबली की उपाधि प्रदान की क्योंकि बली ने अपनी धर्मपरायणता तथा वचनबद्धता के कारण अपने आप को महात्मा साबित कर दिया था। विष्णु ने महाबली को आध्यात्मिक आकाश जाने की अनुमति दे दी जहाँ उनका अपने सद्गुणी दादा प्रहलाद तथा अन्य दैवीय आत्माओं से मिलना हुआ।
वामनावतार के रूप में विष्णु ने बलि को यह पाठ दिया कि दंभ तथा अहंकार से जीवन में कुछ हासिल नहीं होता है और यह भी कि धन-सम्पदा क्षणभंगुर होती है। ऐसा माना जाता है कि विष्णु के दिये वरदान के कारण प्रति वर्ष बली धरती पर अवतरित होते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि उनकी प्रजा खु़शहाल है।

कृष्ण और भीष्म पितामह

जब महाभारत में भीष्म पितामह ने प्रतिज्ञा की कि कल पांडवो को मार डालूँगा,तो भगवान धर्म संकट में आ गए एक ओर भक्त भीष्म की प्रतिज्ञा और दूसरी ओर अर्जुन।
भगवान को नीद नहीं आ रही थी यहाँ से वहाँ,टहल रहे थे,आधी से ज्यादा रात हो गई.भगवान ने सोचा प्रतिज्ञा तो अर्जुन ने भी सुनी होगी अर्जुन को भी नीद नही आ रही होगी.जाकर देखता हूँ,भगवान जैसे ही अर्जुन के शिविर में गए,तो देखा अर्जुन तो खराटे मार-मार कर सो रहे है।
भगवान ने कहा -अर्जुन कल तुम्हारी मौत होने वाली है और तुम चैन की नीद सो रहे हो?
अर्जुन बोले – जब मुझे बचाने वाला बेचेन है,तो फिर मै चैन से क्यों न सोऊ.भगवान समझ गए अब मुझे ही कुछ करना होगा,अब भगवान द्रोपदी के पास गए,बोले द्रोपदी तु विधवा हो गई,द्रोपदी हसने लगी,बोली – मै विधवा हो जाउंगी ये चिंता मै क्यों करूँ
भगवान बोले – द्रोपदी मेरे साथ चल,अब द्रोपदी को ब्रह्म मुहूर्त में पितामह के शिविर में लेकर चलते है,द्रोपदी की चप्पल आवाज कर रही थी,भगवान बोले द्रोपदी चप्पल उतार लो,आवाज कर रही है,हम विपक्ष के शिविर में जा रहे है,द्रोपदी ने चप्पल उतार ली,और भगवान ने द्रोपदी के चप्पल अपने पीताम्बर में बांध ली।
और खूब सिखा कर भेजते है कि क्या करना है.द्रोपदी घूँघट डालकर सुबह ब्रह्म मुहूर्त में जाती है और पितामह के चरण स्पर्श करती है,तो पितामह के मुख से आशीर्वाद निकलता है पुत्री अखंड सौभाग्यवती भव:अब पितामह जैसा अखंड ब्रह्मचारी आशीर्वाद दे,वह कैसे फलीभूत न होता।
जब पितामह को पता चलता है कि ये द्रोपदी है,तो वे समझ जाते है सब करनी केशव की है.द्रोपदी से पूंछा,केशव कहाँ है?द्रोपदी बोली – बाहर है आपके सैनिक ने अंदर नहीं आने दिया,झट बाहर गए और देखा सामने एक पेड़ के नीचे द्रोपदी की चप्पल सिरहाने रखकर सो रहे थे,भीष्म पितामह जी भगवान के चरणों में गिर पड़े और बोले -प्रभु जिस भक्त की चप्पल आपने अपने सिरहाने रख ली , उस भक्त का कोई बाल भी बंका नहीं कर सकता।

उगना महादेव

देवों में देव महादेव की कोई जलती लकड़ी से पिटाई करे ऐसा कोई सोच भी नहीं सकता लेकिन, यह बात बिल्कुल सच है। बात कुछ 1360 ई. के आस-पास की है। उन दिनों बिहार के विस्फी गांव में एक कवि हुआ करते थे। कवि का नाम विद्यापति था। कवि होने के साथ-साथ विद्यापति भगवान शिव के अनन्य भक्त भी थे। इनकी भक्ति और रचनाओं से प्रसन्न होकर भगवान शिव को इनके घर नौकर बनकर रहने की इच्छा हुई।
भगवान शिव एक दिन एक जाहिल गंवार का वेष बनाकर विद्यापति के घर आ गये। विद्यापति को शिव जी ने अपना नाम उगना बताया। विद्यापति की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी अतः उन्होंने उगना को नौकरी पर रखने से मना कर दिया। लेकिन शिव जी मानने वाले कहां थे। सिर्फ दो वक्त के भोजन पर नौकरी करने के लिए तैयार हो गये। इस पर विद्यापति की पत्नी ने विद्यापति से उगना को नौकरी पर रखने के लिए कहा। पत्नी की बात मानकर विद्यापति ने उगना को नौकरी पर रख लिया।
एक दिन उगना विद्यापति के साथ राजा के दरबार में जा रहे थे। तेज गर्मी के वजह से विद्यापति का गला सूखने लगा। लेकिन आस-पास जल का कोई स्रोत नहीं था। विद्यापति ने उगना से कहा कि कहीं से जल का प्रबंध करो अन्यथा मैं प्यासा ही मर जाऊंगा। भगवान शिव कुछ दूर जाकर अपनी जटा खोलकर एक लोटा गंगा जल भर लाए।
विद्यापति ने जब जल पिया तो उन्हें गंगा जल का स्वाद लगा और वह आश्चर्य चकित हो उठे कि इस वन में जहां कहीं जल का स्रोत तक नहीं दिखता यह जल कहां से आया। वह भी ऐसा जल जिसका स्वाद गंगा जल के जैसा है। कवि विद्यापति उगना पर संदेह हो गया कि यह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं बल्कि स्वयं भगवान शिव हैं अतः उगना से उसका वास्तविक परिचय जानने के लिए जिद करने लगे।
जब विद्यापति ने उगना को शिव कहकर उनके चरण पकड़ लिये तब उगना को अपने वास्तविक स्वरूप में आना पड़ा। उगना के स्थान पर स्वयं भगवान शिव प्रकट हो गये। शिव ने विद्यापति से कहा कि मैं तुम्हारे साथ उगना बनकर रहना चाहता हूं लेकिन इस बात को कभी किसी से मेरा वास्तविक परिचय मत बताना।
विद्यापति को बिना मांगे संसार के ईश्वर का सानिध्य मिल चुका था। इन्होंने शिव की शर्त को मान लिया। लेकिन एक दिन विद्यापति की पत्नी सुशीला ने उगना को कोई काम दिया। उगना उस काम को ठीक से नहीं समझा और गलती कर बैठा। सुशीला इससे नाराज हो गयी और चूल्हे से जलती लकड़ी निकालकर लगी शिव जी की पिटाई करने। विद्यापति ने जब यह दृश्य देख तो अनायास ही उनके मुंह से निकल पड़ा ‘ये साक्षात भगवान शिव हैं, इन्हें जलती लकड़ी से मार रही हो।’ फिर क्या था, विद्यापति के मुंह से यह शब्द निकलते ही शिव वहां से अर्न्तध्यान हो गये।
इसके बाद तो विद्यापति पागलों की भांति उगना -उगना कहते हुए वनों में, खेतों में हर जगह उगना बने शिव को ढूंढने लगे। भक्त की ऐसी दशा देखकर शिव को दया आ गयी। भगवान शिव उगना के सामने प्रकट हो गये और कहा कि अब मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकता। उगना रूप में मैं जो तुम्हारे साथ रहा उसके प्रतीक चिन्ह के रूप में अब मैं शिव लिंग के रूप विराजमान रहूंगा। इसके बाद शिव अपने लोक लौट गये और उस स्थान पर शिव लिंग प्रकट हो गया। उगना महादेव का प्रसिद्घ मंदिर वर्तमान में मधुबनी जिला में भवानीपुर गांव में स्थित है।

पत्नी की फटकार

पत्नी की फटकार है अद्भुभुत
अद्भुभुत है पत्नी की मार
पत्नी के ताने सुन सुन कर
खुलते ज्ञान चक्षु के द्वार

दस्यु सुना उत्तर पत्नी का
भरम हो गया अंतर्ध्यान
हार गई पत्नी से दस्युता
बाल्मिकी हुए कवि महान

पत्नी से जब मार पड़ी तो
रोया फूट फूट नादान
कालिदास अनपढ़ मतिमंद
बने कवि विद्वान महान

पत्नी की फटकार सुनी जब
तुलसी भागे छोड़ मकान
राम चरित मानस रच डाला
तुलसीदास भक्त महान

पत्नी छोड़ भागे थे जो जो….
वही बने विद्वान महान
गौतम बुद्ध महावीर तीर्थकर
पत्नी छोड़ बने भगवान

पत्नी छोड़ जो भागा मोदी
हुआ आज है पंत प्रधान

आडवाणी ना छोड़ सके तो
आज तक हैं वो परेशान

नहीँ किया शादी पप्पू ने
ना सुनी पत्नी की तान
इसीलिए करता बकलोली
बना है मूर्ख मूढ़ नादान

आप भी पत्नी छोड़ न पाए
इसीलिए तो हो परेशान
पत्नी छोड़ो बनो सन्यासी
पाओ मोक्ष और निर्वाण