भाग्य से बढ़कर पुरूषार्थ है

*👌भाग्य से बढ़कर पुरूषार्थ है*

राजा विक्रमादित्य के पास सामुद्रिक लक्षण जानने वाला एक ज्योतिषी पहुँचा। विक्रमादित्य का हाथ देखकर वह चिंतामग्न हो गया। उसके शास्त्र के अनुसार तो राजा दीन, दुर्बल और कंगाल होना चाहिए था, लेकिन वह तो सम्राट थे, स्वस्थ थे। लक्षणों में ऐसी विपरीत स्थिति संभवतः उसने पहली बार देखी थी। ज्योतिषी की दशा देखकर विक्रमादित्य उसकी मनोदशा समझ गए और बोले कि ‘बाहरी लक्षणों से यदि आपको संतुष्टि न मिली हो तो छाती चीरकर दिखाता हूँ, भीतर के लक्षण भी देख लीजिए।’ इस पर ज्योतिषी बोला – ‘नहीं, महाराज! मैं समझ गया कि आप निर्भय हैं, पुरूषार्थी हैं, आपमें पूरी क्षमता है। इसीलिए आपने परिस्थितियों को अनुकूल बना लिया है और भाग्य पर विजय प्राप्त कर ली है। यह बात आज मेरी भी समझ में आ गई है कि ‘युग मनुष्य को नहीं बनाता, बल्कि मनुष्य युग का निर्माण करने की क्षमता रखता है यदि उसमें पुरूषार्थ हो, क्योंकि एक पुरूषार्थी मनुष्य में ही हाथ की लकीरों को बदलने की सामाथ्य होती है।’

अर्थात स्थिति एवं दशा मनुष्य का निर्माण नहीं करती, यह तो मनुष्य है जो स्थिति का निर्माण करता है। एक दास स्वतंत्र व्यक्ति हो सकता है और सम्राट एक दास बन सकता है।

उपरोक्त प्रसंग से ये बातें प्रकाश में आती हैं-

हम स्वयं परिस्थितियों को अनुकूल या प्रतिकूल बनाते हैं, अपने विचारों से, अपनी सोच से। जो व्यक्ति यह सोचता है कि वह निर्धन है, तो उसके विचार भी निर्धन होते हैं। विचारों की निर्धनता के कारण ही वह आर्थिक रूप से विपन्न होता है। यह विपन्नता उसे इस कदर लाचार कर देती है, कि उसे धरती पर बिखरी संपन्नता नजर ही नहीं आती। नजर आते हैं सिर्फ संपन्न लोग, उनके ठाठबाट और शानो-शौकत जो उसे कुंठित करते हैं, जबकि उनसे प्रेरणा लेकर वह भी संपन्न होने की कोशिश कर सकता है। अतः जरूरत है अपनी सोच में बदलाव लाने की।

मन की स्थिती अजेय है, अपराजेय है। उसकी दृढ़ इच्छा-शक्ति मनुष्य को विवश कर देती है कि वह किसी की परवाह किए बिना अपने काम को जी-जान से पूरा करें, अपनी सामर्थ्य से उस काम को पूरा करे।

मनुष्य निर्धनता और संपन्नता का सम्बन्ध भाग्य से जोड़ता है। वह सोचता है कि जो सौभाग्यशाली है, लक्ष्य उस पर प्रसन्न रहती है और बदकिस्मती का मारा कोशिश करने के बावजूद निर्धन ही बना रहता है।

*निष्कर्ष:*

सफलता की मुख्य शर्त है- पुरूषार्थ। पुरूषार्थ करने से ही *’सार्थक जीवन’* बनता है, केवल भाग्यवादी रहकर नहीं। भाग्य तो अतीत में किए गए कर्मों के संचित फलों का मूल है, जो मनुष्य को सुखःदुःख के रूप में भोगने को मिलते हैं और वे फल भोगने के पश्चात क्षीण हो जाते हैं। विशेष बात यह है कि भोग करने का समय भी निश्चित नहीं है। ऐसी स्थिति में वह कब तक भाग्य के भरोसे सुख की प्रतीक्षा करता रहेगा?

यथार्थ में पुरूषार्थ करने में ही जीवन की सफलता सुनिश्ति है, जबकि व्यक्ति भाग्य के सहारे निष्क्रियता को जन्म देकर अपने सुनहरे अवसर को नष्ट कर देता है। महाभारत के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण यदि चाहते तो पांडवों को पलक झपकते ही विजय दिला देते, किन्तु वे नहीं चाहते थे कि बिना कर्म किए उन्हें यश मिले। उन्होंने अर्जुन को कर्मयोग का पाठ पढ़ाकर उसे युद्ध में संलग्न कराया और फिर विजय-श्री एवं कीर्ति दिलवाकर उसे लोक-परलोक में यशस्वी बनाया।

अतः आप विकास की नई-नई मंजिलें तय करने और उन्नति की पराकाष्ठा पर पहुँचने के लिए अपने पुरूषार्थ को कभी शिथिल न होने दें और पूर्ण उत्साह के साथ आगे बढ़ते रहें।

पुरूषार्थ उसी में है जो संकट की घड़ी में निर्णय लेने में संकोच नहीं करता।

*-वेदव्यास: महाभारत*

योग

योग भारतीय संस्कृति की एक महत्वपूर्ण देन है. आज पुरे विश्व में यह फ़ैल चूका है. कारण स्पष्ट है- इसकी उपयोगिता से कोई इन्कार नहीं कर सकता. ऐसे में हम भारतीय के लिए यह और भी अहम् हो जाता है कि इसकी पुरातन परम्परा को आगे बढाया जाये. हमें इसके तत्वों को जानना, समझना व अपने जीवन में उतारना अतिआवश्यक है. आप अपने पास जो साहित्य है उसका अध्ययन करें, योग्य गुरु से सीखें, टीवी में देखें, ऑनलाइन पढ़े. अगर आप ऑनलाइन देखना चाहे तो इसके लिए एक वेबसाइट है जिसका पत्ता है–  http://shivyoga.net/  .इस पर आप वेद,पुराण,गीता,रामायण,महाभारत आदि योग के महत्वपूर्ण ग्रन्थ पढ़ सकतें हैं.साथ ही आसन भी सीख सकतें हैं.
यहाँ मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि योग मात्र आसन करना नहीं है. गीता के 18 अध्यायों में 18 योग वर्णित हैं, अन्य सभी ग्रन्थ भी योगों से भरे पड़े हैं. प्रारंभ में योग में शारीरिक और मानसिक क्रियाएं सीखना ठीक रहता है. आपका मन कभी एकला नहीं रहता वह किसी न किसी भाव या विचार  के द्वारा दूसरों से जुड़ा रहता है. बच्चा पैदा होते ही अपनी माता से जुड़ जाता है. जीवन भर आल-जुन्जाल में जुड़ता जाता है. अंत में सब से मुक्त हो होता है.

खास बात

खास बात …जीवन में सबसे कठिन व जरुरी काम है, अपने आपको सुधारना, अपने आप पर नियंत्रण रखना, अपने शरीर को इच्छानुसार चलाना, व सबसे खास बात अपने विचारों को नियंत्रित करना. योग सिद्धि के लिय अपने विचारों, भावों व मन को अपनी इच्छानुसार चलाना. मन के गुलाम नहीं बनना है, बल्कि मन को गुलाम बनाना है अपना. मन को इधर उधर भटकने मत दो.
भगवान का वास…श्रृष्टि की रचना करते समय कर्ता ने अपने रहने की जगह भी बनाई . मानव आकाश पाताल सब जगह अपनी पंहुच बना सकता है. खुद के अन्दर झांक कर नहीं देखेगा. इसलिय भगवान सबके मन में ही बस गया ताकि, मानव जो बाहर देखेगा भगवान को, तो नहीं मिलेगा. इसलिए कहा है भगवान और कहीं नहीं आपके अन्दर ही मोजूद हैं. उसे बाहर मत ढूंडो, अपने अन्दर खोजो वह तो आपके अन्दर बैठा है. भगवान कोई चीज नही है, क्योंकि चीजें सभी नष्ट होने वाली हैं, परन्तु भगवान तो अजर अमर हैं. अब चूँकि भगवान हमारे अन्दर हैं तो हम भी अजर अमर हो गए. यही बात कृष्ण भगवान ने गीता में जगह जगह बताई है. आत्मा अमर है, इसको कोई नष्ट नहीं कर सकता.
योग का लक्ष्य..दूसरी बात आत्मा सो परमात्मा ! हमारी आत्मा उस परमात्मा का ही अंश है. इसीलिए वो परमात्मा बंटकर के सबके मन में बस गया. सबकी आत्मा में उसका अंश मौजूद है. अंश किसी के शरीर में कम तो  किसी के शरीर में ज्यादा है. राम से कृष्ण में ज्यादा मानते हैं. मानव में कम ऋषि मुनियों में ज्यादा. हम चाहे तो इसके अंश को बढ़ा सकता हैं. उसको पहचानकर, योग करके उसकी शक्ति बढ़ा सकते हैं. योग का यही लक्ष्य है अपने अन्दर बैठे परमात्मा से साक्षात्कार करना.

विद्यार्थी

  1. बापू :- तने “iti ” करवा दी फेर बी तू घर के तार ठीक
    नही करता,
    मिस्तरी बुलाणा पडे है ….
    .
    छोरा :- iti कमाने- खाने  खातिर की है ! फोगट में चिप के मरने खातिर  नही की है ।😝😝😝

माँ की देन

☝एक बार इस कविता को
💘दिल से पढ़िये
😋शब्द शब्द में गहराई है…

⛺जब आंख खुली तो अम्‍मा की
⛺गोदी का एक सहारा था
⛺उसका नन्‍हा सा आंचल मुझको
⛺भूमण्‍डल से प्‍यारा था

🌹उसके चेहरे की झलक देख
🌹चेहरा फूलों सा खिलता था
🌹उसके स्‍तन की एक बूंद से
🌹मुझको जीवन मिलता था

👄हाथों से बालों को नोंचा
👄पैरों से खूब प्रहार कियाद
👄फिर भी उस मां ने पुचकारा
👄हमको जी भर के प्‍यार किया

🌹मैं उसका राजा बेटा था
🌹वो आंख का तारा कहती थी
🌹मैं बनूं बुढापे में उसका
🌹बस एक सहारा कहती थी

🌂उंगली को पकड. चलाया था
🌂पढने विद्यालय भेजा था
🌂मेरी नादानी को भी निज
🌂अन्‍तर में सदा सहेजा था

🌹मेरे सारे प्रश्‍नों का वो
🌹फौरन जवाब बन जाती थी
🌹मेरी राहों के कांटे चुन
🌹वो खुद गुलाब बन जाती थी

👓मैं बडा हुआ तो कॉलेज से
👓इक रोग प्‍यार का ले आया
👓जिस दिल में मां की मूरत थी
👓वो रामकली को दे आया

🌹शादी की पति से बाप बना
🌹अपने रिश्‍तों में झूल गया
🌹अब करवाचौथ मनाता हूं
🌹मां की ममता को भूल गया

☝हम भूल गये उसकी ममता
☝मेरे जीवन की थाती थी
☝हम भूल गये अपना जीवन
☝वो अमृत वाली छाती थी

🌹हम भूल गये वो खुद भूखी
🌹रह करके हमें खिलाती थी
🌹हमको सूखा बिस्‍तर देकर
🌹खुद गीले में सो जाती थी

💻हम भूल गये उसने ही
💻होठों को भाषा सिखलायी थी
💻मेरी नीदों के लिए रात भर
💻उसने लोरी गायी थी

🌹हम भूल गये हर गलती पर
🌹उसने डांटा समझाया था
🌹बच जाउं बुरी नजर से
🌹काला टीका सदा लगाया था

🏯हम बडे हुए तो ममता वाले
🏯सारे बन्‍धन तोड. आए
🏯बंगले में कुत्‍ते पाल लिए
🏯मां को वृद्धाश्रम छोड आए

🌹उसके सपनों का महल गिरा कर
🌹कंकर-कंकर बीन लिए
🌹खुदग़र्जी में उसके सुहाग के
🌹आभूषण तक छीन लिए

👑हम मां को घर के बंटवारे की
👑अभिलाषा तक ले आए
👑उसको पावन मंदिर से
👑गाली की भाषा तक ले आए

🌹मां की ममता को देख मौत भी
🌹आगे से हट जाती है
🌹गर मां अपमानित होती
🌹धरती की छाती फट जाती है

💧घर को पूरा जीवन देकर
💧बेचारी मां क्‍या पाती है
💧रूखा सूखा खा लेती है
💧पानी पीकर सो जाती है

🌹जो मां जैसी देवी घर के
🌹मंदिर में नहीं रख सकते हैं
🌹वो लाखों पुण्‍य भले कर लें
🌹इंसान नहीं बन सकते हैं

✋मां जिसको भी जल दे दे
✋वो पौधा संदल बन जाता है
✋मां के चरणों को छूकर पानी
✋गंगाजल बन जाता है

🌹मां के आंचल ने युगों-युगों से
🌹भगवानों को पाला है
🌹मां के चरणों में जन्‍नत है
🌹गिरिजाघर और शिवाला है
🌹हर घर में मां की पूजा हो
🌹ऐसा संकल्‍प उठाता हूं
🌹मैं दुनियां की हर मां के
🌹चरणों में ये शीश झुकाता हूं…

कहानी तीन दोस्तों की

🌹🌹 कहानी तीन बेस्ट दोस्तों की
😌😌😌
ज्ञान , धन
और
विश्वास
तीनों बहुत अच्छे दोस्त
भी थे
तीनों में बहुत प्यार
भी था
एक वक़्त आया
जब
तीनों को
जुदा होना पड़ा
तीनों ने एक दुसरे से
सवाल किया
कि
हम कहाँ मिलेंगे
ज्ञान ने कहा
मैं
मंदिर , विद्यालय
मैं
मिलूँगा
धन ने कहा
मैं
अमीरों के पास मिलूँगा
विश्वास
चुप था
दोनों ने चुप होने की
वजह पुछी
तो
विश्वास ने
रोते हुवे कहा
मैं
एक बार चला ग़या
तो
फिर कभी नही
मिलूँगा

जीवणों दौरो होग्यो- राजस्थानी कविता

जीवणों दौरो होग्यो
———————–
घणां पालिया शौक जीवणों दोरो होग्यो रे
देवे राम नें दोष जमानों फौरो होग्यो रे

च्यारानां री सब्जी ल्यांता आठानां री दाल
दोन्यूं सिक्का चाले कोनीं भूंडा होग्या हाल
च्यार दिनां तक जान जींमती घी की भेंती धार
एक टेम में छींकां आवे ल्याणां पडे उधार
जीवणों दोरो———————————–

मुंडे मूंड बात कर लेंता नहीं लागतो टक्को
बिनां कियां रिचार्ज रुके है मोबाईल रो चक्को
लालटेन में तेल घालता रात काटता सारी
बिजली रा बिल रा झटका सूं आंख्यां आय अंधारी
जीवणों दोरो—————————————-

लाड कोड सुं लाडी ल्यांता करती घर रो काम
पढी लिखी बिनणिंयां बैठी दिनभर करै आराम
घाल पर्स में नोट बीनणीं ब्यूटी पारलर जावे
बैल बणें घाणीं रो बालम परणीं मोज उडावे
जीवणों दौरो—————————————-

टी वी रा चक्कर में टाबर भूल्या खाणों पीणों
चौका छक्का रा हल्ला में मुश्किल होग्यो जीणों
बिल माथै बिल आंता रेवे कोई दिन जाय नीं खाली
लूंण तेल शक्कर री खातर रोज लडै घरवाली
जीवणों दौरो—————————————–

एक रुपैयो फीस लागती पूरी साल पढाई
पाटी बस्ता पोथी का भी रुप्या लागता ढाई
पापाजी री पूरी तनखा एडमिशन में लागे
फीस किताबां ड्रेसां न्यारी ट्यूशन रा भी लागे
जीवणों दौरो—————————————-

सुख री नींद कदै नीं आवे टेंशन ऊपर टैंशन
दो दिन में पूरी हो ज्यावे तनखा हो या पैंशन
गुटखां रा रेपर बिखरयोडा थांरी हंसी उडावे
रोग लगेला साफ लिख्यो पणं दूणां दूणां खावे
जीवणों दौरो————————————–
पैदल चलणों भूली दुनियां गाडी ऊपर गाडी
आगे बैठे टाबर टींगर लारै बैठे लाडी
मैडम केवे पीवर में म्हें कदै नीं चाली पाली
मन में सोचे साब गला में केडी आफत घाली
जीवणों दोरो————————————–

चाऐ पेट में लडै ऊंदरा पेटरोल भरवावे
मावस पूनम राखणं वाला संडे च्यार मनावे
होटलां में करे पार्टी डिस्को डांस रचावे
नशा पता में गेला होकर घर में राड मचावे
जीवणों दौरो ——————————————

अंगरेजी री पूंछ पकडली हिंदी कोनीं आवे
कोका कोला पीवे पेप्सी छाछ राब नहीं भावे
कीकर पडसी पार मुंग्याडो नितरो बढतो जावे
सुख रा साधन रा चक्कर में दुखडा बढता जावे
जितरी चादर पांव पसारो मन पर काबू राखो
गजानंद भगवान भज्यां ही भलो होवसी थांको
जीवणों दौरो होग्यो रे
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इंजीनियरिंग छात्र

एक इंजीनियरिंग स्टूडेंट छत पर खड़ा था…

तभी पड़ोस के अंकल:
‘तो बेटा अब आगे क्या सोचा है’.?

स्टूडेंट:
“बस अंकल, टंकी भरते ही, मोटर बंद कर दूंगा”..

बेटी व माँ

एक गरीब परिवार में एक सुन्दर सी बेटी👰 ने जन्म लिया..

बाप दुखी हो गया बेटा पैदा होता तो कम से कम काम में तो हाथ बटाता,,
उसने बेटी को पाला जरूर,
मगर दिल से नही….

वो पढने जाती थी तो ना ही स्कूल की फीस टाइम से जमा करता,
और ना ही कापी किताबों पर ध्यान देता था…
अक्सर दारू पी कर घर में कोहराम मचाता था……..

उस लडकी की मॉ बहुत अच्छी व बहुत भोली भाली थी वो अपनी बेटी को बडे लाड प्यार से रखती थी..
वो पति से छुपा-छुपा कर बेटी की फीस जमा करती
और कापी किताबों का खर्चा देती थी..
अपना पेट काटकर फटे पुराने कपडे पहन कर गुजारा कर लेती थी,
मगर बेटी का पूरा खयाल रखती थी…

पति अक्सर घर से कई कई दिनों के लिये गायब हो जाता था.

जितना कमाता था दारू मे ही फूक देता था…

वक्त का पहिया घूमता गया




बेटी धीरे-धीरे समझदार हो गयी..
दसवीं क्लास में उसका एडमीसन होना था.
मॉ के पास इतने पैसै ना थे जो बेटी का स्कूल में दाखिला करा पाती..
बेटी डरडराते हुये पापा से बोली:
पापा मैं पढना चाहती हूं मेरा हाईस्कूल में एडमीसन करा दीजिए मम्मी के पास पैसै नही है…
बेटी की बात सुनते ही बाप आग वबूला हो गया और चिल्लाने लगा बोला: तू कितनी भी पड लिख जाये तुझे तो चौका चूल्हा ही सम्भालना है क्या करेगी तू ज्यादा पड लिख कर..

उस दिन उसने घर में आतंक मचाया व सबको मारा पीटा

बाप का व्यहार देखकर बेटी ने मन ही मन में सोच लिया कि अब वो आगे की पढाई नही करेगी….
एक दिन उसकी मॉ बाजार गयी

बेटी ने पूछा:मॉ कहॉ गयी थी
मॉ ने उसकी बात को अनसुना करते हुये कहा :
बेटी कल मै तेरा स्कूल में दाखिला कराउगी
बेटी ने कहा: नही़ं मॉ मै अब नही पडूगी मेरी वजह से तुम्हे कितनी परेशानी उठानी पडती है पापा भी तुमको मारते पीटते हैं कहते कहते रोने लगी..
मॉ ने उसे सीने से लगाते हुये कहा: बेटी मै बाजार से कुछ रुपये लेकर आयी हूं मै कराउगी तेरा दखिला..
बेटी ने मॉ की ओर देखते हुये पूछा: मॉ तुम इतने पैसै कहॉसे लायी हो??
मॉ ने उसकी बात को फिर अनसुना कर दिया…

वक्त वीतता गया



“मॉ ने जी तोड मेहनत करके बेटी को पढाया लिखाया
बेटी ने भी मॉ की मेहनत को देखते हुये मन लगा कर दिन रात पढाई की
और आगे बडती चली गयी…….
“”””
“””””””
“”””””””””
इधर बाप दारू पी पी कर बीमार पड गया
डाक्टर के पास ले गये
डाक्टर ने कहा इनको टी.बी. है
“””
“””””
एक दिन तबियत ज्यादा गम्भीर होने पर बेहोशी की हालत में अस्पताल में भर्ती कराया..
दो दिन बाद उस जबे होश आया तो डाक्टरनी का चेहरा देखकर उसके होश उड गये😳😳
वो डाक्टरनी कोई और नही वल्कि उसकी

अपनी बेटी थी..

शर्म से पानी पानी बाप
कपडे से अपना चेहरा छुपाने लगा
और रोने लगा हाथ जोडकर बोला: बेटी मुझे माफ करना मैं तुझे समझ ना सका…

दोस्तों बेटी 💎आखिर बेटी होती है
,,,,,,,,
बाप को रोते 😥देखकर बेटी ने बाप को गले लगा लिया..

“”””””
दोस्तों गरीबी और अमीरी से कोई फर्क नहीं पडता,,
अगर इन्सान का इरादा हो तो आसमान में भी छेद हो सकता है

किसी ने खूब कहा //

“कौन कहता है कि आसमान मे छेद नही हो सकता,,
अरे एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों”

“””

एक दिन बेटी माँ से बोली: माँ तुमने मुझे आजतक नहीं बताया कि मेरे हाईस्कूल के एडमीसन के लिये पैसै कहाँ से लायी थी??

बेटी के बार बार पूछने पर
माँ ने जो बात बतायी
उसे सुनकर
बेटी की रूह काँप गयी….

माँ ने अपने शरीर का खून बेच कर बेटी का एडमीसन कराया था….

दोस्तों तभी तो मॉ को भगवान का दर्जा दिया गया है
माँ जितना औलाद के लिये त्याग कर सकती है
उतना दुनियाँ में कोई और नही..

दो पंक्तियाँ माँ के लिये::::
गोदी में मुझको सुलाया है माँ ने,,
बडे प्यार से अपनी मीठी जुवॉ से,
बेटा कह कर बुलाया है माँ ने,,
मुझको लेके अपनी नरम बाजुओं मे,
मोहब्बत का झूला झुलाया है माँ ने,,
सभी जख्म अपने सीने पे लेके,
हर चोट से बचाया है माँ ने,,
कभी मेरे माथे पे काला टीका लगा के,
यूं बचपन में मुझको सजाया है माँ ने,,
यूं चेहरा दिखा के मुझे रोज अपना,
मुझे मेरे रव से मिलाया है माँ ने,,
ऐ इन्सॉ तू जो इतना इतरा के चलता है,
काबिल तुझे इसके बनाया है माँ ने,, 

👶👦👧👨/////////

सबसे बडा प्रेम

एक औरत ने तीन संतों को अपने घर के सामने
देखा। वह उन्हें जानती नहीं थी।

औरत ने कहा –
“कृपया भीतर आइये और भोजन करिए।”

संत बोले – “क्या तुम्हारे पति घर पर हैं?”

औरत – “नहीं, वे अभी बाहर गए हैं।”

संत –“हम तभी भीतर आयेंगे जब वह घर पर
हों।”

शाम को उस औरत का पति घर आया और
औरत ने उसे यह सब बताया।

पति – “जाओ और उनसे कहो कि मैं घर
आ गया हूँ और उनको आदर सहित बुलाओ।”

औरत बाहर गई और उनको भीतर आने के
लिए कहा।

संत बोले – “हम सब किसी भी घर में एक साथ
नहीं जाते।”

“पर क्यों?” – औरत ने पूछा।

उनमें से एक संत ने कहा – “मेरा नाम धन है”

फ़िर दूसरे संतों की ओर इशारा कर के कहा –
“इन दोनों के नाम सफलता और प्रेम हैं।

हममें से कोई एक ही भीतर आ सकता है।

आप घर के अन्य सदस्यों से मिलकर तय कर
लें कि भीतर किसे निमंत्रित करना है।”

औरत ने भीतर जाकर अपने पति को यह सब
बताया।

उसका पति बहुत प्रसन्न हो गया और

बोला –“यदि ऐसा है तो हमें धन को आमंत्रित
करना चाहिए।
हमारा घर खुशियों से भर जाएगा।”

पत्नी – “मुझे लगता है कि हमें सफलता को
आमंत्रित करना चाहिए।”

उनकी बेटी दूसरे कमरे से यह सब सुन रही थी।
वह उनके पास आई और बोली –
“मुझे लगता है कि हमें प्रेम को आमंत्रित करना
चाहिए। प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं हैं।”

“तुम ठीक कहती हो, हमें प्रेम
को ही बुलाना चाहिए” – उसके माता-पिता ने
कहा।

औरत घर के बाहर गई और उसने संतों से पूछा –
“आप में से जिनका नाम प्रेम है वे कृपया घर में
प्रवेश कर भोजन गृहण करें।”

प्रेम घर की ओर बढ़ चले।

बाकी के दो संत भी उनके
पीछे चलने लगे।

औरत ने आश्चर्य से उन दोनों से पूछा –
“मैंने
तो सिर्फ़ प्रेम को आमंत्रित किया था। आप लोग
भीतर क्यों जा रहे हैं?”

उनमें से एक ने कहा – “यदि आपने धन और
सफलता में से किसी एक को आमंत्रित किया होता
तो केवल वही भीतर जाता।

आपने प्रेम को आमंत्रित किया है।

प्रेम कभी अकेला नहीं जाता।
प्रेम जहाँ-जहाँ जाता है, धन और सफलता
उसके पीछे जाते हैं।

अच्छा लगे तो प्रेम के साथ रहें, 💖💖

प्रेम बाटें, प्रेम दें और प्रेम लें

क्यों कि प्रेम ही
सफल जीवन का राज है।

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏