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हनुमानजी हनुमानजी हनुमानजी हनुमानजी हनुमानजी हनुमानजी
ॐ श्री हनुमते नमः    जय श्री राम-लक्ष्मण        जय सीताराम     जय श्री हनुमान   श्री हनुमते नमः         श्री हनुमते नमः
सबके संकटहार, 11वें रुद्रावतार, सबके तारणहार, हनुमानजी, बालाजी, बजरंगबलीजी जहाँ जहाँ राम का नाम है वहाँ-वहाँ उपस्थित हैं. सोचो राम का नाम कहाँ नहीं है? ऐसी तो कोई जगह नहीं जहाँ राम नहीं, हनुमान नहीं. बस यह जान लेना ही काफी है.

सदगुणों की खानः श्री हनुमानजी

एक दिन भगवान श्री रामचन्द्रजी और भगवती सीताजी झूले पर विराजमान थे। हनुमानजी आये और झूला झुलाने लगे। सीताजी ने कहा : "हनुमान ! पानी...." रामजी ने कहा : “झूला झुलाओ।" हनुमानजी झूले की रस्सी हाथ में लिये हुए पानी लेने गये; झूला भी झूल रहा है और पानी भी ले आये। इस तरह हनुमानजी पूरी कुशलता से कर्म करते। कार्य की सफलता का सामर्थ्य कहाँ है, यह जानते हैं हनुमानजी। वे विश्रांति पाना जानते हैं। हनुमानजी को न परिणाम का भय है, न कर्मफल के भोग की कामना है, न लापरवाही है और न पलायनवादिता है।

हनुमानजी की भक्ति है 'निर्भरा भक्ति' – एकनिष्ठ भक्ति। अपने राम स्वभाव में ही निर्भर, कर्मफल पर निर्भर नहीं। स्वर्ग और मुक्ति आत्म-विश्रांति वालों के आगे कोई मायना नहीं रखती। हनुमानजी कहते हैं- "प्रभु ! आपकी भक्ति से जो प्रेमरस मिल रहा है वह अवर्णनीय है, अनिर्वचनीय है। मुझे मुक्ति क्या चाहिए, स्वर्ग क्या चाहिए, प्रभु ! आप सेवा दे रहे हैं, बस पर्याप्त है।" हनुमानजी का व्यवहार भगवान रामजी को, माँ सीताजी को और तो और लक्ष्मण भैया को भी आह्लादित करता था। लक्ष्मण कहते हैं : 'मैं वर्षों तक माँ सीताजी के चरणों में रहा किन्तु मैं सेवा करने में उतना सफल नहीं हुआ, उतना विश्वास-संपादन नहीं कर सका, जितना हनुमानजी आप.... मेरी कुछ लापरवाही के कारण सीताजी का अपहरण हो गया पर हनुमानजी ! आपके प्रयास से सीताजी खोजी गयीं। श्रीरामजी तक सीताजी को पहुँचाने का, उनका मिलन कराने का भगीरथ कार्य आपने किया। आप लंका गये और पहली बार माँ सीता के साथ आपका जो वार्तालाप हुआ, उससे माँ सीता प्रसन्न हो गयीं व आप पर विश्वास के साथ-साथ वरदानों की वृष्टि की। हम इतने वरदान नहीं पा सके, इतने विश्वासपात्र नहीं हो सके।'

हनुमानजी लंका जाते हैं। वहाँ विभीषण उनको कहते हैं : सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।। "हे पवनसुत हनुमान ! हमारी रहनी कैसी है ? जैसे दाँतों के बीच जीभ रहती है, ऐसे रावण और उसके साथियों के बीच मैं अकेला रहता हूँ। तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।। मुझ अनाथ को कैसे वे सूर्यवंशी भगवान राम जानेंगे और कैसे सनाथ करेंगे? मेरी भक्ति कैसे फलेगी ? क्योंकि हम कैसे हैं? अब सुनो : तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।। दैत्य लोग (राक्षस योनि) हैं, तामस तन है। भगवान के चरणों में प्रीति नहीं है। जो प्रीतिपूर्वक भजते हैं उन्हें बुद्धियोग मिलता है। हम तामसी लोग प्रीति भी तो नहीं कर सकते लेकिन अब मुझे भरोसा हो रहा है क्योंकि हनुमान ! तुम्हारा दर्शन हुआ है। अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता ।। भगवान की मुझ पर कृपा है तभी तुम्हारे जैसे संत मिले हैं।"

हनुमानजी ने एक ही मुलाकात में विभीषण को भी ढाढ़स बँधाया, स्नेहभरी सांत्वना दी और प्रभु की महानता के प्रति अहोभाव से भर दिया। श्री हनुमानजी कहते हैं : सुनहु विभीषन प्रभु कैरीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती।। "विभीषणजी सुनो ! तुम बोलते हो हमारा तामस शरीर है। हम दाँतों के बीच रहनेवाली जिह्वा जैसे हैं। हमारा कैसा जीवन है? हम प्रभु को कैसे पा सकते हैं ? तो निराश होने की, घबराने की जरूरत नहीं है, भैया ! भगवान सेवक पर प्रीति करते हैं। फिर सेवक पढ़ा है कि अनपढ़ है, धनी है कि निर्धन है, माई है कि भाई है – यह नहीं देखते। जो कह दे कि 'भगवान ! मैं तेरी शरण हूँ।' बस, प्रभु उसे अपना सेवक मान लेते हैं। कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना ।। अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर । मैं कौन-सा कुलीन हूँ ? मुझमें ऐसा कौन-सा गुण है परंतु भगवान के सेवक होने मात्र के भाव से भगवान ने मुझे इतना ऊँचा कार्य दे दिया, ऊँचा पद दे दिया।" कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर ।। भगवान के गुणों का सुमिरन करते-करते हनुमानजी की आँखें भर आती हैं। कैसे उत्तम सेवक हैं हनुमानजी कि जो उनके सम्पर्क में आता है, उसको अपने प्रभु की भक्ति देते-देते स्वयं भी भक्तिभाव से आँखें छलका देते हैं, अपना हृदय उभार लेते हैं। हनुमानजी अशोक वाटिका में सीताजी के पास जाते हैं । सीताजी पहली बार मिले हुए हनुमानजी पर, वह भी जो वानर रूप में हैं, कैसे विश्वास करें? फिर भी हनुमानजी का ऐसा मधुर व्यवहार, ऐसी विश्वास-संपादन करने की कुशलता कि - कपि के वचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास। उन्होंने हनुमानजी के प्रेमयुक्त वचन सुने और उन्हें विश्वास हुआ कि 'हाँ, ये रामजी के ही दूत हैं।' जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास।। 'ये मन से, कर्म से, वचन से कृपासिंधु भगवान राम के ही दास हैं।' ऐसा उनको जाना। मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी।। और सीताजी के मन में संतोष हुआ। आपकी वाणी से किसी का आत्मसंतोष नहीं बढ़ा तो आपका बोलना किस काम का ? आपकी वाणी से किसीकी योग्यता नहीं निखरी, किसी का दुःख दूर न हुआ, किसीका अज्ञान-अंश नहीं घटा और ज्ञान नहीं बढ़ा तो आपका बोलना व्यर्थ हो गया।

हनुमानजी कहते हैं : 'हम बंदर हैं, फिर भी सबसे ज्यादा बड़भागी हैं।' हम सब सेवक अति बड़भागी। संतत सगुन ब्रह्म अनुरागी ।। यहाँ हनुमानजी की सरलता और प्रभु-तत्त्व को पहचानने की बुद्धिमत्ता का दर्शन होता है । निर्गुण-निराकार ब्रह्म आँखों से दिखता नहीं है और सगुण-साकार कभी-कभी अवतरित होता है। हनुमानजी कहते हैं : "हम भक्तिमार्ग पर चलकर भगवान के सेवाकार्य करते हुए भगवत्स्वरूप की यात्रा कर रहे हैं और हम भगवान के पास नहीं गये, भगवान स्वयं चलकर हमारी ओर आये, इसलिए हम अति बड़भागी हैं। राम काज कारन तनु त्यागी। हरि पुर गयउ परम बड़भागी।। जटायु राम-काज में तन छोड़कर हरि के धाम में गये। प्रभुसेवा में देह-उत्सर्ग करनेवाले जटायु परम बड़भागी हो सकते हैं। अहिल्या बड़भागी हो सकती है, कोई भाग्यशाली हो सकते हैं परंतु हम तो अति बड़भागी हैं।"

 हनुमानजी ने सुग्रीव पर, विभीषण पर उपकार किया, उन्हें रामजी से मिला दिया, राज्य पद दिला दिया। वे राज करनेवालों में से नहीं थे, राज्य दिलानेवालों में से थे। यश लेनेवालों में से नहीं थे, हनुमानजी यश दिलानेवालों में से थे। वे सेवा करानेवालों में से नहीं थे, सेवा करनेवालों में से थे; सुख लेनेवालों में से नहीं थे, सुख देनेवालों में से थे; मान लेनेवालों में से नहीं थे, मान देनेवालों में से थे। काश ! हम भी ये गुण अपने में लाना चाहें। इसमें क्या कठिनाई है? क्या जोर पड़ता है? मन को समझायें और मंगलमय हनुमानजी का मंगलकारी चरित्र बार-बार पढ़ें-पढ़ायें । एकटक उनकी ओर देखें और भावना करें कि 'महाराज ! ये सदगुण हम अपने में भरें, अपने चित्त को पावन करें।’

जय जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।। महाराज ! गुरुदेव की नाईं कृपा करो महाराज ! .....हनुमानजी महाराज !....  हनुमानजी के सदगुण हम लोगों के चित्त में फलें-फूलें। "हनुमान ! तुमने तो मेरे को अच्छी बात सुनायी। जैसे जयंत के पीछे प्रभु श्रीराम ने बाण छोड़ा था और उसके छक्के छुड़ा दिये थे कि 'जयंत ! कौए के रूप में सीता के पैर को चोंच मारने का क्या फल होता है, देख।' किंतु रावण मुझे उठाकर ले आया और प्रभु ने मेरे को भुला दिया, इस बात से मैं व्यथित थी। परंतु हनुमान ! तुमने मुझे यह बताकर कि 'माताजी ! आपकी सेवा में प्रभु ने हनुमानरूपी तीर को छोड़ा है।' मेरा भ्रम मिटा दिया, संदेह मिटा दिया।" – ऐसा कहकर सीताजी हनुमानजी की प्रशंसा करती हैं तो हनुमानजी दूर से चरणों में लेटते हुए बोले : "पाहिमाम् ! रक्षमाम् ! मातेश्वरी ! जो प्रभु चाहते हैं वह तो पहले से ही होना था। माँ ! आप सब कुछ जानती हैं और मेरी सराहना कर रही हैं? पाहिमाम् ! रक्षमाम् !" यह हनुमानजी का कितना बड़ा सदगुण है, कितनी सरलता है, कितनी बुद्धिमत्ता है ! आप हनुमानजी की इस बुद्धिमत्ता को, सरलता को, सहजता को जीवन में उतारने की कृपा करें तो आपके शुभ संकल्प का बल बढ़ जायेगा। एको ब्रह्म द्वितीयोनास्ति, नेह नानास्ति किञ्चन । 'अद्वैत एक ब्रह्म के सिवाय और कुछ नहीं है।'

 ऐसा कहनेवाले अद्वैतवादी आद्य शंकराचार्यजी ने भी पंचश्लोकी 'श्री हनुमत्पंचरत्न स्तोत्र' में हनुमानजी के बारे में क्या सुन्दर वर्णन किया है ! शंकराचार्यजी ने कहा हैः जो भगवान श्रीराम और सीताजी का चिंतन कर हृदय से पुलकित हो जाते हैं, जिनके कर्म सुन्दर हैं, जिन्होंने सत्कर्म, परोपकार से कर्मों को कर्मयोग बना लिया है, ऐसे श्री हनुमानजी का सुमिरन करके मैं भी उन्हें स्नेह करता हूँ और उनका ध्यान धरता हूँ। आद्य शंकराचार्य भगवान जिनका ध्यान धरते हैं, उन हनुमानजी को अगर आप और हम मिलकर मन-ही-मन प्रसन्न करना चाहें तो कैसे करें? हनुमानजी खुशामद प्रिय नहीं हैं, वे राम प्रिय हैं। तो आप क्या करोगे? आप राम का भजन करो। आप राम के प्यारे हुए तो हनुमानजी आपको अपने-आप प्यार करने लगेंगे। अन्तर्यामी राम की प्रसन्नता के लिए लोककार्य करो, लोगों से मिलो और विश्रांति लोकेश्वर में पाओ। अपने आत्मा-राम में आराम पाओ। कर्म सुख लेने के लिए नहीं, देने के लिए करो। कर्म मान लेने के लिए नहीं, देने के लिए करो तो तुम्हारा कर्म कर्मयोग, भक्तियोग हो जायेगा। हनुमन्तजी मेरे प्यारे हैं, दिल के दुलारे हैं, आप भी उनके दुलारे हो जायेंगे।

1. सदगुणों की खानः श्री हनुमानजी
2. श्री हनुमान चालीसा
3. श्री हनुमान भजन-संगीत