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महाभारत
महाभारत · आदिपर्व · सभापर्व · वनपर्व · विराटपर्व · उद्योगपर्व · भीष्मपर्व · द्रोणपर्व · कर्णपर्व · शल्यपर्व · सौप्तिकपर्व · स्त्रीपर्व · शान्तिपर्व · अनुशासनपर्व · आश्वमेधिकपर्व · आश्रमवासिकपर्व · मौसलपर्व · महाप्रास्थानिकपर्व · स्वर्गारोहणपर्व

आदि पर्व की संक्षिप्त कथा इस प्रकार है- जैसा कि नाम से ही विदित होता है, यह महाभारत जैसे विशाल ग्रन्थ की मूल प्रस्तावना है। प्रारम्भ में महाभारत के पर्वों और उनके विषयों का संक्षिप्त संग्रह है। कथा-प्रवेश के बाद च्यवन का जन्म, पुलोमा दानव का भस्म होना, जनमेजय के सर्पसत्र की सूचना, नागों का वंश, कद्रू कद्रू और विनता की कथा, देवों-दानवों द्वारा समुद्र मंथन, परीक्षित का आख्यान, सर्पसत्र, राजा उपरिचर का वृत्तान्त, व्यास आदि की उत्पत्ति, दुष्यन्त-शकुन्तला की कथा, पुरूरवा, नहुष और ययाति के चरित्र का वर्णन, भीष्म का जन्म और कौरवों-पाण्डवों की उत्पत्ति, कर्ण-द्रोण आदि का वृत्तान्त, द्रुपद की कथा, लाक्षागृह का वृत्तान्त, हिडिम्ब का वध और हिडिम्बा का विवाह, बकासुर का वध, धृष्टद्युम्न और द्रौपदी की उत्पत्ति, द्रौपदी-स्वयंवर और विवाह, पाण्डव का हस्तिनापुर में आगमन, सुन्द-उपसुन्द की कथा, नियम भंग के कारण अर्जुन का वनवास, सुभद्राहरण और विवाह, खाण्डव-दहन और मयासुर रक्षण की कथा वर्णित है।

आदिपर्व- वंश-परिचय

शांतनु और भीष्म

विचित्रवीर्य से अंबिका को धृतराष्ट्र तथा अंबालिका को पांडु नामक पुत्र पैदा हुए। विचित्रवीर्य की मृत्यु के बाद पांडु को राजगद्दी पर बिठाया गया, क्योंकि धृतराष्ट्र जन्मांध थे। भीष्म ने अंबिका की एक दासी के पुत्र विदुर का लालन-पालन भी राजकुमारों की तरह किया था। यही विदुर धर्म-नीति के पंडित हुए। Blockquote-close.gif प्राचीन भारत में ययाति नाम के प्रतापी राजा राज करते थे, जिनकी राजधानी खांडवप्रस्थ थी। इसी स्थान पर आगे चलकर इंद्रप्रस्थ भी बसा था। ययाति की दो रानियाँ थीं- असुरों के गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी असुरों के राजा वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा। देवयानी से दो पुत्र हुए- यदु और तुर्वसु। यदु के नाम से आगे चलकर यदु वंश चला जिसमें श्रीकृष्ण भी पैदा हुए। शर्मिष्ठा के तीन पुत्र हुए, जिनमें सबसे छोटा पुरु बहुत पराक्रमी तथा पितृभक्त था। ययाति ने पुरु को ही अपना उत्तराधिकारी बनाया। पुरु के नाम से ही पुरु वंश की परंपरा चली। पुरु के वंश में ही आगे चलकर दुष्यंत हुए जिन्होंने शकुंतला से विवाह किया तथा उनके पुत्र भरत के नाम पर ही हमारे देश का नाम भारत पड़ा। भरत के वंश में 'हस्तिन' नाम के राजा हुए जिन्होंने अपनी नई राजधानी हस्तिनापुर में बसाई। हस्तिन के राजवंश में कुरु नाम के राजा हुए जिनके वंशज कौरव कहलाए। कुरु के नाम से ही कुरुक्षेत्र प्रसिद्ध हुआ।

शांतनु

कौरव राजवंश में शांतनु नाम के प्रतापी राजा हुए। शांतनु ने भगवती गंगा से विवाह किया था। कहा जाता है कि एक-बार अष्ट-वसु नाम के आठ देवताओं से तंग आकर वसिष्ठ मुनि ने उन्हें शाप दिया कि उन्हें मनुष्य योनि में जन्म लेना होगा। परंतु आठों वसुओं की प्रार्थना पर, मुनि ने कहा कि सात वसुओं का तो जन्म लेते ही उद्धार हो जाएगा, पर सबसे उत्पाती वसु प्रभास को मृत्यु-लोक में बहुत दिन तक रहना होगा। इन्हीं अष्ट वसुओं को शाप से मुक्त कराने के लिए भगवती गंगा ने उनकी माँ बनना स्वीकार किया। शांतनु से विवाह करने पर गंगा को आठ पुत्र हुए। सात को तो गंगा ने पैदा होते ही अपनी धारा में बहा दिया। आठवें पुत्र को शांतनु ने नहीं बहाने दिया, तब गंगा इस पुत्र को अपने साथ स्वर्ग ले गई तथा इसका नाम देवव्रत रखा। देवव्रत ही आगे चलकर भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुए। एक दिन गंगा तट पर शांतनु ने देखा कि एक बालक ने अपने बाणों से गंगा के प्रवाह को रोक रखा है तभी गंगा प्रकट हुई तथा शांतनु को बताया कि यह आपका पुत्र देवव्रत है। शांतनु ने इसी पुत्र को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।

भीष्म प्रतिज्ञा

एक बार शांतनु ने यमुना नदी के किनारे एक सुंदर धीवर कन्या सत्यवती को देखा तथा उससे विवाह करने की इच्छा प्रकट की। सत्यवती का पिता विवाह के लिए तैयार हो गया, पर उसने एक शर्त रखी कि उसकी कन्या का पुत्र ही राज्य का उत्तराधिकारी होगा। शर्त को सुनकर राजा सोच में पड़ गए तथा दुखी रहने लगे। पिता के दुख को जानकर देवव्रत स्वयं धीवर के पास गए तथा कहा कि आपकी कन्या का पुत्र ही राज्य का उत्तराधिकारी होगा। धीवर ने कहा कि मुझे आपकी बात पर पूरा भरोसा है, पर आपका पुत्र यदि राज्य का दावा करेगा तो मेरी कन्या के पुत्र का क्या होगा। इस पर देवव्रत ने प्रतिज्ञा की कि मैं आजन्म ब्रह्मचारी रहूँगा तथा आपकी कन्या का पुत्र ही राज्य का उत्तराधिकारी होगा। देवव्रत की इस भीषण प्रतिज्ञा के कारण ही उन्हें भीष्म कहा जाता है। शांतनु का विवाह सत्यवती से हो गया तथा उन्हें दो पुत्र हुए- चित्रांगद विचित्रवीर्य शांतनु के बाद चित्रांगद ही गद्दी पर बैठे। चित्रांगद की मृत्यु के बाद विचित्रवीर्य गद्दी पर बैठे।

धृतराष्ट्र और पांडु

विचित्रवीर्य के विवाह योग्य होने पर, भीष्म को काशी नरेश की तीन कन्याओं अंबा, अंबिका और अंबालिका के स्वयंवर का निमंत्रण मिला। भीष्म विचित्रवीर्य को साथ लेकर स्वयंवर में गए तथा तीनों राजकन्याओं को बलपूर्वक रथ में बैठाकर ले आए। अंबा ने भीष्म से निवेदन किया कि मैं मन से शाल्वराज को अपना पति मान चुकी हूँ, इसीलिए भीष्म ने उसे मुक्त कर दिया और अंबिका एवं अंबालिका से विचित्रवीर्य का विवाह हो गया। अंबा शाल्वराज के पास पहुँची, पर शाल्वराज ने उसे स्वीकार नहीं किया। दुखी अंबा का मन भीष्म से बदला लेने का वर प्राप्त किया। आगे चलकर यही अंबा शिखंडी के रूप में जन्मी तथा भीष्म की मृत्यु का कारण भी बनी। विचित्रवीर्य से अंबिका को धृतराष्ट्र तथा अंबालिका को पांडु नामक पुत्र पैदा हुए। विचित्रवीर्य की मृत्यु के बाद पांडु को राजगद्दी पर बिठाया गया, क्योंकि धृतराष्ट्र जन्मांध थे। भीष्म ने अंबिका की एक दासी के पुत्र विदुर का लालन-पालन भी राजकुमारों की तरह किया था। यही विदुर धर्म-नीति के पंडित हुए। धृतराष्ट्र का विवाह गांधारी से हुआ था। गांधारी धृतराष्ट्र के अंधा होने के कारण अपनी आँखों पर भी पट्टी बाँधे रहती थी। धृतराष्ट्र के सौ पुत्र एक पुत्री हुई। पुत्रों में सबसे बड़ा दुर्योधन तथा पुत्री का नाम था दुःशला, जिसका विवाह जयद्रथ से हुआ था। धृतराष्ट्र की दूसरी पत्नी [1] से युयुत्सु नाम का पुत्र पैदा हुआ था।  शस्त्र-शिक्षा में पांडव कौरवों से सदा आगे रहते थे। एक दिन जब बे शस्त्र-विद्या का अभ्यास कर रहे थे, उनकी गेंद एक कुएँ में गिर गई। युधिष्ठिर ने जब कुएँ में झाँका तो उनकी अँगूठी भी कुएँ में गिर गई। तभी उन्हें एक तेजस्वी ब्राह्मण उधर आता दिखाई दिया। ब्राह्मण ने राजकुमारों की चिंता का कारण पूछा तथा एक सींक मंत्र पढ़कर कुएँ में छोड़ी। वह सींक गेंद पर तीर की तरह चुभ गई। इसी तरह उसने कई और सींके कुएँ में फेंकी जो एक-दूसरे के ऊपरी सिरों पर चिपकती चली गईं। जब सींक इतनी लंबी हो गई कि कुएँ के सिरे तक आ गई तो उन्होंने सींक को खींच लिया तथा गेंद बाहर आ गई। राजकुमारों को बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने युधिष्ठिर की अँगूठी भी निकालने की प्रार्थना की। ब्राह्मण ने धनुष से बाण चलाकर अँगूठी को बाण की नोक में फँसाकर बाहर निकाल दिया। नाम पूछने पर पता चला कि वे आचार्य द्रोण थे। पांडु का विवाह शूरसेन की कन्या पृथा से हुआ, उसी को कुंती के नाम से भी जाना जाता था, जो श्रीकृष्ण की बुआ लगती थी। कुंती की सेवा से प्रसन्न होकर दुर्वासा ऋषि ने उसे एक ऐसा मंत्र बताया था जिससे वह किसी देवता का आह्वान कर सकती थी। कौमार्य में ही कुंती ने मंत्र की परीक्षा लेने के लिए सूर्य का आह्वान किया तथा सूर्य की कृपा से उसे एक पुत्र की प्राप्ति हुई। लोक-लाज के भय से कुंती ने उसे गंगा में बहा दिया। कौरवों के सारथी अधिरथ ने उसका पालन-पोषण किया। कर्ण के नाम से प्रसिद्ध यह बालक सारथी द्वारा पाला गया था, इसीलिए सूत-पुत्र कहलाया। कुंती से पांडु के तीन पुत्र हुए - युधिष्ठिर भीम अर्जुन उनकी दूसरी पत्नी माद्री से उन्हें नकुल तथा सहदेव प्राप्त हुए। इस प्रकार धृतराष्ट्र के पुत्र कौरव तथा पांडु के पुत्र पांडव कहलाए। वन विहार करते समय पांडु की मृत्यु हो गई तथा उनकी रानी माद्री उन्हीं की चिता के साथ सती हो गई। कुंती ने ही पाँचों पुत्रों का पालन-पोषण किया।

कौरव-पांडव

कौरवों तथा पांडवों की शिक्षा कृपाचार्य की देख-रेख में होने लगी। दुर्योधन धृतराष्ट्र का सबसे बड़ा पुत्र होने के कारण अपने आपको ही राज्य का उत्तराधिकारी समझता था। वह पांडवों से ईर्ष्या रखता था तथा भीम से विशेष रूप से जलता था। भीम भी कौरवों को खूब सताता था। दुर्योधन ने भीम को मारने की योजना बनाई। वह जल-क्रीड़ा के बहाने भीम को गंगातट पर ले गया। उसने भीम के भोजन में विष मिलवा दिया तथा जब वे अचेत होकर ज़मीन पर गिर पड़े तो लताओं से बाँधकर गंगा में बहा दिया। भीम के घर न पहुँचने पर सभी को बहुत चिंता हुई। गंगा में बहते समय भीम को विषैले नागों ने डस लिया तथा नागों के विष से भोजन के विष का प्रभाव समाप्त हो गया। वे जल से बाहर आ गए। पांडव भीम को जीवित पाकर बहुत प्रसन्न हुए और दुर्योधन तथा उसके भाइयों में फिर से चिंता व्याप्त हो गई।

 कौरवों और पांडवों की शस्त्र-शिक्षा

शस्त्र-शिक्षा में पांडव कौरवों से सदा आगे रहते थे। एक दिन जब बे शस्त्र-विद्या का अभ्यास कर रहे थे, उनकी गेंद एक कुएँ में गिर गई। युधिष्ठिर ने जब कुएँ में झाँका तो उनकी अँगूठी भी कुएँ में गिर गई। तभी उन्हें एक तेजस्वी ब्राह्मण उधर आता दिखाई दिया। ब्राह्मण ने राजकुमारों की चिंता का कारण पूछा तथा एक सींक मंत्र पढ़कर कुएँ में छोड़ी। वह सींक गेंद पर तीर की तरह चुभ गई। इसी तरह उसने कई और सींके कुएँ में फेंकी जो एक-दूसरे के ऊपरी सिरों पर चिपकती चली गईं। जब सींक इतनी लंबी हो गई कि कुएँ के सिरे तक आ गई तो उन्होंने सींक को खींच लिया तथा गेंद बाहर आ गई। राजकुमारों को बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने युधिष्ठिर की अँगूठी भी निकालने की प्रार्थना की। ब्राह्मण ने धनुष से बाण चलाकर अँगूठी को बाण की नोक में फँसाकर बाहर निकाल दिया। नाम पूछने पर पता चला कि वे आचार्य द्रोण थे। उनका विवाह कृपाचार्य की बहन कृपी से हुआ था तथा उनके पुत्र का नाम अश्वत्थामा था। पांचाल के राजा द्रुपद आचार्य द्रोण के सहपाठी थे तथा दोनों में गहरी मित्रता थी। द्रुपद ने उनसे वायदा किया था कि राजा बनने पर वे द्रोण को आधा राज्य दे देंगे, पर राजा बनने पर उन्होंने न केवल अपना वायदा भुला दिया, अपितु द्रोण का अपमान भी किया। तभी से द्रोण के मन में द्रुपद से बदला लेने की भावना घर कर गई थी। द्रोणाचार्य की शस्त्र-विद्या से प्रभावित होकर भीष्म ने द्रोणाचार्य को राजकुमारों की शिक्षा-दीक्षा के लिए रख लिया। इनकी शिक्षा से सभी राजकुमार धनुर्विद्या में निपुण हो गए, पर अर्जुन सबसे दक्ष थे तथा इसीलिए द्रोण को सबसे अधिक प्रिय भी थे।

लक्ष्य-भेद की परीक्षा

एक दिन गुरु द्रोण ने सभी शिष्यों की परीक्षा ली। उन्होंने एक पेड़ की ऊँची डाल पर लकड़ी की एक चिड़िया रख दी तथा कहा कि चिड़िया की आँख में लक्ष्य-भेद करना है। सबसे पहले युधिष्ठिर की बारी आई। द्रोण ने उनसे पूछा कि तुम इस समय क्या देख रहे हो। युधिष्ठिर ने बताया कि मैं आपको तथा पेड़ की डाल पर रखी चिड़िया को देख रहा हूँ। द्रोण ने उनसे कहा कि तुमसे लक्ष्य-भेद न होगा। एक-दूसरे करके सभी राजकुमारों ने लगभग ऐसा ही उत्तर दिया तथा द्रोण ने सभी को हटा दिया। अंत में अर्जुन की बारी आई। जब वही प्रश्न अर्जुन से किया गया तो उन्होंने कहा कि मुझे केवल चिड़िया की आँख ही दिखाई दे रही है। यह कहकर अर्जुन ने तीर चलाया, जो चिड़िया की आँख में लगा। उस दिन से अर्जुन द्रोणाचार्य के और भी प्रिय हो गए।

गुरु-भक्त एकलव्य

एक दिन एकलव्य नाम का भील बालक गुरु द्रोण के पास धनुर्विद्या सीखने की इच्छा से लाया। गुरु द्रोण ने उसे बताया कि वे केवल राजकुमारों को ही शिक्षा देते हैं। बालक चला गया, पर उसने गुरु द्रोण की मूर्ति बनाकर धनुर्विद्या का अभ्यास किया तथा ही धनुर्विद्या में निपुण हो गया। एक दिन सभी राजकुमार जंगल में खेलने गए। एक कुत्ता भी उनके आगे-आगे चल रहा था। कुछ आहट पाकर वह भौंकने लगा। एकलव्य ने एक-एक करके कई तीर छोड़े जो कुत्ते के मुँह में जा घुसे कुत्ते का भौंकना बंद हो गया, पर उसे कहीं चोट नहीं आई। राजकुमारों को बहुत आश्चर्य हुआ। जब उन्होंने एकलव्य से पूछा कि उसे धनुर्विद्या किसने सिखाई है, तो उसने द्रोण की मूर्ति की ओर इशारा किया तथा कहा-आचार्य द्रोण ने। राजधानी लौटकर राजकुमारों ने एकलव्य की धनुर्विद्या का समाचार गुरु द्रोण को सुनाया तथा कहा कि एकलव्य ने धनुर्विद्या में हमसे भी अधिक कुशलता प्राप्त कर ली है। गुरु द्रोण ने बताया कि एकलव्य को जो सिद्धि मिली है, वह उसकी गुरु-भक्ति तथा श्रद्धा का परिणाम है। शस्त्र- संचालन का प्रदर्शन एक दिन पितामह भीष्म ने गुरु द्रोण से सलाह करके के शस्त्र-संचालन के प्रदर्शन की व्यवस्था की। निश्चित समय पर रंगस्थली दर्शकों से भर गई। भीष्म, धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती, विदुर आदि सभी उपस्थित थे। सभी ने अपना-अपना कौशल दिखाया तथा सभी का मन मोह लिया। विदुर ने धृतराष्ट्र को प्रदर्शन का वृत्तांत सुनाया। भीम और दुर्योधन ने गदा-युद्ध का कौशल दिखाया। दोनों एक-दूसरे से ईर्ष्या रखते थे, अतः एक दूसरे पर वार करने लगे लगे, पर गुरु द्रोण ने संकेत पर अश्वत्थामा ने उन्हें अलग-अलग कर दिया।

कर्ण की चुनौती

अर्जुन की धनुर्विद्या की प्रशंसा सभी कर रहे थे कि इसी समय कर्ण आगे आया तथा अपनी कला दिखाने की इच्छा व्यक्त करते हुए बोला कि जो कुछ अर्जुन ने किया, वह मेरे लिए अत्यंत साधारण-सी बात है। कर्ण ने कहा कि मैं अर्जुन से द्वंद्व-युद्ध करना चाहता हूँ। पर कृपाचार्य ने उसे सूतपुत्र कहकर द्वंद्व-युद्ध की बात काट दी, क्योंकि राजकुमार से द्वंद्व-युद्ध करने का अधिकारी राजकुमार ही होता है। इस पर दुर्योधन ने कर्ण को अंग देश का राजा घोषित कर दिया तथा सभाभवन में ही उसका राजतिलक कर दिया। अर्जुन ने कर्ण से कहा कि कर्ण तुम वीर हो, पर तुम यह मत समझो कि वीरता का वरदान केवल तुम्हें ही मिला है। संध्या हो चली थी, इसीलिए पितामह भीष्म ने प्रदर्शन को बंद करने का आदेश दे दिया। अर्जुन की गर्वोक्ति कर्ण के मन में चोट बनकर रह गई।

राजा द्रुपद से प्रतिशोध

एक दिन द्रोणाचार्य ने सभी राजकुमारों को बुलाकर शस्त्र-विद्या की शिक्षा के बदले गुरुदक्षिणा माँगी। उन्होंने द्रुपद को पकड़कर अपने सामने लाने की आज्ञा दी। गुरु की आज्ञा मानकर पांडवों ने पांचाल राज्य पर आक्रमण कर दिया तथा द्रुपद को पकड़कर द्रोण के सामने उपस्थित किया। इस प्रकार द्रोण ने द्रुपद से बदला ले लिया। बाद में द्रुपद ने भी अपने इस अपमान का बदला लेने के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ किया तथा उन्हें धृष्टद्युम्न नामक पुत्र पैदा हुआ। जिसने महाभारत के युद्ध नें द्रोणाचार्य का वध किया।

लाक्षागृह-दाह

दुर्योधन दिन-रात इसी चिंता में रहता कि किसी प्रकार पांडवों का नाश करके हस्तिनापुर पर राज्य कर सके। कौरवों-पांडवों में युधिष्ठिर सबसे बड़े थे तथा इसीलिए सिंहासन के उत्तराधिकारी समझे जाते थे। पर दुर्योधन सोचता था कि उसके पिता ज्येष्ठ होने पर भी जन्मांध होने के कारण गद्दी न पा सके, तो इससे उत्तराधिकारी का नियम तो नहीं बदल जाता। धृतराष्ट्र का बड़ा पुत्र होने के कारण मैं ही गद्दी का अधिकारी हूँ। शकुनि, कर्ण, दु:शासन, आदि दुर्योधन के साथ थे। दुर्योधन ने पांडवों की बुराई करके धृतराष्ट्र को भी अपने पक्ष में कर लिया तथा पिता से पांडवों को वरणावर्त के मेले में भेजने को कहा। दुर्योधन एक योजना बनाकर पांडवों का नाश करना चाहता था। धृतराष्ट्र की आज्ञा से पांडव वरणावर्त चले गए। उनके जाते समय विदुर ने युधिष्ठिर को सावधान कर दिया तथा अगले संदेश की प्रतीक्षा करने को कहा।

 एक दिन अर्जुन राजभवन के द्वार पर बैठे थे, तभी एक ब्राह्मण रोता हुआ आया और उसने बताया कि चोर उसकी गाएँ चुरा ले गए हैं। अर्जुन उस समय निरस्त्र थे। उनके अस्त्र घर में थे, जहाँ युधिष्ठिर द्रौपदी के साथ थे। अर्जुन धर्म-संकट में पड़ गए। यदि हथियार लेने घर में जाते हैं, तो बारह वर्ष का वनवास होगा और यदि गायों को नहीं छुड़ाते तो ब्राह्मण से शाप मिलेगा। अंत में वे सिर झुकाकर घर में गए तथा अस्त्र ले आए। उन्होंने ब्राह्मण की गायें छुड़ाकर ब्राह्मण को दे दी। अर्जुन ने युधिष्ठिर से बारह वर्ष के वनवास की आज्ञा माँगी। युधिष्ठिर ने बहुत समझाया, पर अर्जुन, माता कुंती तथा भाइयों से मिलकर बारह वर्ष के वनवास के लिए निकल पड़े।

दुर्योधन ने पुरोचन नाम के एक मंत्री से मिलकर वरणावर्त में लाख के एक महल में पांडवों को जलाकर मार डालने की योजना बना ली थी। लाख का वह महल ऐसा बनवाया गया था जो आग के स्पर्श से ही पूरी तरह जल उठे तथा पांडव जल मरें। जैसे ही पांडव वरणावर्त में बने लाख महल में जाने को तैयार हुए विदुर ने उन्हें एक संदेश भेजकर दुर्योधन की सारी योजना से सावधान करा दिया। एक कारीगर ने महल से बाहर निकलने के लिए सुरंग बना दी। पांडव महल के भीतर नहीं, इसी सुरंग में सोया करते थे, जिससे कि महल में आग लगने पर जल्दी ही बाहर निकल सकें। कृष्ण चतुर्दशी के दिन युधिष्ठिर को पुरोचन के रंग-ढंग से अहसास हो गया कि महल में आज रात को ही आग लगाई जाएगी। युधिष्ठिर ने अपने भाइयों को सचेत कर दिया। पांडवों ने उस दिन यज्ञ किया था, जिसमें नगरवासियों के साथ एक भीलनी ने भी अपने पाँच पुत्रों के साथ भोजन किया था। भोजन के बाद वह भीलनी महल में ही सो गई। पुरोचन महल के बाहरी कमरे में सो रहा था। भीम ने रात को महल में आग लगा लगा दी तथा माता कुंती को लेकर सुरंग से बाहर आ गए। पुरेचन तथा अपने पुत्रों के साथ भीलनी जल मरी है। हस्तिनापुर में शोक छा गया, पर विदुर को विश्वास था कि पांडव अवश्य ही बच निकले होंगे। लाक्षागृह से निकलकर पांडव दुर्गम वन पार करते हुए गंगा तट पहुँचे, जहाँ उन्हें विदुर का भेजा एक आदमी नाव के साथ मिला था पांडव उसी नाव में गंगा पार हो गए।

हिडिंब का वध

गंगा पार करके पांडव दक्षिण की ओर बढ़ते रहे तथा घने जंगल में पहुँच गए। थकान और भूख-प्यास से सभी का बुरा हाल था। भीम सबको एक वट-वृक्ष के नीचे बैठाकर पानी की तलाश में इधर-उधर देखने लगे। पेड़ पर चढ़कर उन्होंने पास ही कुछ पक्षी देखे तथा समझ लिया कि अवश्य ही उधर पानी है। वे उसी तरफ गए तथा एक जलाशय के किनारे पहुँच गए, जहाँ उन्होंने अपनी प्यास बुझाई तथा स्नान किया। वे माता और भाइयों के लिए भी पानी लाए। थकान होने के कारण वे सब सो गए थे। उस जलाशय के पास हिडिंब नाम का एक राक्षस रहता था। उसकी बहन हिडिंबा का भी उसी के साथ रहती थी। जैसे ही राक्षस को मानव-गंध मिली, उसने अपनी बहन को उन्हें मारकर मांस लाने को भेजा हिडिंबा भीम को देखकर मोहित हो गई। उसने सुंदर युवती का रूप धारण कर लिया तथा बोली कि मेरे भाई ने मुझे तुम्हें मारने के लिए भेजा था, पर मैं तुमसे विवाह करना चाहती हूँ। सोए हुए लोगों को जगाओ, जिससे कि मैं उन्हें अपनी माया से सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दूँ। यदि मेरा भाई यहाँ आ गया, तो वह सबको मार डालेगा। वह बड़ा क्रूर तथा बलवान है। भीम ने कहा कि मुझे तुम्हारे भाई से कोई भय नहीं है। तभी वहाँ हिडिंब आ गया। जब उसने अपनी बहन को सुंदर युवती के रूप में भीम से बात करते देखा तो अत्यंत क्रुद्ध हो गया। पहले वह हिडिंबा को ही मारने दौड़ा। भीम ने उसे बीच में ही पकड़ लिया। दोनों में भयंकर युद्ध होने लगा। शोर सुनकर पांडव तथा माता कुंती जाग गईं। तभी भीम ने हिडिंब को पटक दिया, तथा उसके प्राण निकल गए। माता कुंती ने युधिष्ठिर की सलाह पर भीम को हिडिंबा से विवाह करने की अनुमति दे दी। समय पर उसे एक पुत्र प्राप्त हुआ। जिसका नाम घटोत्कच रखा गया। वह बहुत पराक्रमी योद्धा हुआ। जब भीम अपनी माता और भाइयों के साथ उस वन को छोड़कर आगे जाने की तैयारी करने लगे तो घटोत्कच ने भीम से कहा कि, 'पिताजी जब भी ज़रूरत हो, मुझे याद कीजिएगा। मैं आपकी सेवा में उपस्थित हो जाऊँगा।'

बकासुर-संहार

वन-मार्ग पर चलते-चलते एक दिन पांडवों की भेंट महर्षि व्यास से हुई। महर्षि व्यास ने पांडवों को ढाँढ़स बँधाया तथा उन्हीं की सलाह पर पांडव ब्रह्मचारियों का वेश धारण कर एकचक्रा नामक नगरी में एक ब्राह्मण के घर रहने लगे। पाँचों भाई भिक्षा माँगकर लाते तथा उसी को बाँटकर अपना पेट भरते। एक दिन भीम घर पर रह गए। तभी कुंती ने अपने आश्रयदाता ब्राह्मण के घर रोने की आवाज़ सुनी। पूछने पर पता चला कि बक नाम का एक राक्षस नगर के पास ही गुफ़ा में रहता है, जो लोगों को जहाँ भी देखता, मारकर खा जाता था। नगरवासियों ने उससे तंग आकर एक समझौता कर लिया कि हर सप्ताह उसकी गुफ़ा में गाड़ी भरकर मांस, मदिरा, पकवान आदि भेज दिया जाएगा तथा गाड़ीवान भी उसी खुराक में शामिल होगा। उस दिन गाड़ीवान के रूप में उस ब्राह्मण को जाना था। वहाँ पहुँचकर वह कभी ज़िंदा वापस नहीं आ सकेगा, इसीलिए घर के सभी लोग रो रहे हैं। कुंती ने ब्राह्मण को धीरज बँधाया तथा कहा कि उसकी जगह मेरा पुत्र भीम चला जाएगा तथा बकासुर उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेगा। भीम भोजन तथा पकवान से भरी गाड़ी लेकर राक्षस की गुफ़ा तक पहुँचा तथा उसने उससे अपनी पेट-पूजा शुरू कर दी। बकासुर ने गुफ़ा से देखा कि एक विशाल शरीर वाला मनुष्य उसके भोजन को खा रहा है। वह भीम से भिड़ गया। भीम ने उसे लात-घूँसे मार-मारकर जान से मार डाला तथा उसकी लाश को नगर-द्वार तक ले आए। नगरवासियों की प्रसन्नता की सीमा न रही।

द्रौपदी-स्वयंवर

एकचक्रा नगरी में रहते हुए पांडवों ने पांचाल देश के राजा यज्ञसेन [2] की पुत्री द्रौपदी के स्वयंवर का समाचार सुना। तभी वहाँ व्यास भी आ गए। उनकी सलाह माता कुंती को साथ लेकर पांडव स्वयंवर देखने चल पड़े। रास्ते में पांडवों को धौम्य ऋषि मिले। पांडवों ने उन्हें अपना पुरोहित बना लिया। पांचाल राज्य पहुँचकर माता की सलाह से राजधानी के निकट एक कुम्हार के घर में टिक गए। स्वयंवर के दिन राजधानी को सजाया गया था। देश-देश के राजा उसमें भाग लेने आए थे। हस्तिनापुर से कर्ण, दुर्योधन, दुशासन भी आए थे। स्वयंवर-भूमि के मध्य भाग में आकाश में एक मछली स्थिर थी। उसके नीचे एक चक्र बराबर घूम रहा था। नीचे पानी में मछली की परछाई को देखकर, जो उसकी आँख बेध सके, वही द्रौपदी से विवाह कर सकता था।

मत्स्य-भेदन

एक-एक करके अनेक राजाओं ने प्रयास किया, पर कोई भी मछली की आँख को नहीं वेध सका। कर्ण निशाना साधने चला, पर सूतपुत्र कहे जाने के कारण उसे बैठ जाना पड़ा। अंत में ब्राह्मण वेशधारी अर्जुन ने एक तीर से मछली की आँख वेध दी। उपस्थित राजाओं की शंका पर अर्जुन ने दूसरी बार निशाना लगाकर मछली को ही नीचे गिरा दिया। द्रौपदी ने अर्जुन के गले में वरमाला पहना दी। कुछ राजाओं ने ब्राह्मण वेशधारी से द्रौपदी को छीनने का प्रयास किया, पर जब भीम एक विशाल पेड़ उखाड़कर ले आए तो उनका साहस टूट गया। जब द्रौपदी तथा धृष्टद्युम्न को पता चला उसने अर्जुन का वरण किया, तो उसकी प्रसन्नता की सीमा न रही। घर पहुँचकर अर्जुन ने बाहर से ही माँ को बताया कि देखो कितनी अच्छी चीज़ लाया हूँ, तो भीतर से ही माता कुंती ने उत्तर दिया कि जो लाए हो, पाँचों भाई बाँट लो। माता कुंती ने जैसे ही बाहर आकर देखा तो असमंजस में पड़ गई, पर अर्जुन ने कहा कि माँ, तुम्हारा वचन मिथ्या नहीं होगा। तथा द्रौपदी से पाँचों भाइयों का विवाह होगा। जब द्रुपद ने सुना कि द्रौपदी का विवाह पाँचों पांडवों से होगा, तो बड़े चिंतित हुए। उसी समय महर्षि व्यास आ गए तथा उन्होंने द्रौपदी के पूर्व जन्म की कथा सुनाकर बताया कि उसे शंकर से पाँच पतियों का वरदान मिला है। इस प्रकार द्रौपदी से पाँचों पांडवों का विवाह हो गया।

पांडवों की हस्तिनापुर वापसी और इंदप्रस्थ की स्थापना

पांडवों के लाक्षागृह से बच निकलने तथा द्रौपदी के विवाह का समाचार चारों ओर फैल गया। धृतराष्ट्र इस समाचार से प्रसन्न नहीं थे, पर बाहरी प्रसन्नता प्रकट कर रहे थे। भीष्म और द्रोणाचार्य ने पांडवों को वापस बुलाने का मत प्रकट किया। यद्यपि दुर्योधन और कर्ण ने इसका विरोध किया, पर विदुर की सलाह पर धृतराष्ट्र ने उन्हीं को उन्हीं को पांडवों को लाने पांचाल भेजा। पांडवों की वापसी पर नगर-निवासियों ने बड़े हर्ष से उनका स्वागत किया। धृतराष्ट्र ने उन्हें आधा राज्य देकर सलाह दी कि कलह से बचने के लिए हस्तिनापुर छोड़कर खांडवप्रस्थ को अपनी राजधानी बना लें। धृतराष्ट्र की आज्ञा मानकर युधिष्ठिर सपरिवार खांडवप्रस्थ आ गए तथा वहाँ उन्होंने नई राजधानी बसाई जिसका नाम इंद्रप्रस्थ रखा। तेरह वर्ष तक सुखपूर्वक उन्होंने राज्य किया।

अर्जुन का वनवास

एक दिन इंद्रप्रस्थ में नारद मुनि आए तथा द्रौपदी को सलाह दी कि वह पाँचों पांडवों के साथ रहने का नियम बना ले कि वह हर एक के साथ एक-एक मास रहेगी। जिससे भी यह नियम भंग हो, उसे घर छोड़कर बारह वर्ष का वनवास करना होगा। पांडव इस नियम का पालन करने लगे। एक दिन अर्जुन राजभवन के द्वार पर बैठे थे, तभी एक ब्राह्मण रोता हुआ आया और उसने बताया कि चोर उसकी गाएँ चुरा ले गए हैं। अर्जुन उस समय निरस्त्र थे। उनके अस्त्र घर में थे, जहाँ युधिष्ठिर द्रौपदी के साथ थे। अर्जुन धर्म-संकट में पड़ गए। यदि हथियार लेने घर में जाते हैं, तो बारह वर्ष का वनवास होगा और यदि गायों को नहीं छुड़ाते तो ब्राह्मण से शाप मिलेगा। अंत में वे सिर झुकाकर घर में गए तथा अस्त्र ले आए। उन्होंने ब्राह्मण की गायें छुड़ाकर ब्राह्मण को दे दी। अर्जुन ने युधिष्ठिर से बारह वर्ष के वनवास की आज्ञा माँगी। युधिष्ठिर ने बहुत समझाया, पर अर्जुन, माता कुंती तथा भाइयों से मिलकर बारह वर्ष के वनवास के लिए निकल पड़े।

नागकन्या उलूपी से अर्जुन का विवाह

देश-देश में घूमते हुए अर्जुन हरिद्वार पहुँचे। गंगा में स्नान करते समय नागराज कैरव्य की कन्या उलूपी अर्जुन पर मोहित हो गई। वह अर्जुन को पाताल लोक ले गई तथा उनसे विवाह किया। उलूपी ने अर्जुन को वरदान दिया कि आप जल में भी स्थल की तरह चल सकेंगे।

चित्रांगदा से अर्जुन का विवाह

नागलोक से ऊपर आकर अर्जुन अनेक तीर्थों का भ्रमण करते हुए मणिपुर पहुँचे, जहाँ की राजकन्या चित्रांगदा अत्यंत रूपवती थी। अर्जुन ने चित्रांगदा से विवाह किया। तीन वर्ष तक अर्जुन मणिपुर में चित्रांगदा के साथ रहे तथा उन्हें बभ्रुवाहन नाम का एक पुत्र भी प्राप्त हुआ।

सुभद्रा से अर्जुन का विवाह

मणिपुर से पंचतीर्थ होते हुए अर्जुन प्रभास तीर्थ पहुँचे। यह तीर्थ कृष्ण के राज्य में था। कृष्ण ने अर्जुन का स्वागत किया। यहाँ रहते हुए बलराम की बहन सुभद्रा के प्रति अर्जुन के मन में प्रेम पैदा हो गया। कृष्ण को जब इसका पता चला तो उन्होंने अर्जुन से कहा कि तुम सुभद्रा का हरण कर लो क्योंकि यादवों से युद्ध में विजय प्राप्त करके ही तुम सुभद्रा से विवाह कर सकते हो। अर्जुन ने सुभद्रा का हरण कर लिया। यादवों ने अर्जुन का पीछा किया तथा घोर युद्ध छिड़ गया। अर्जुन के सामने यादवों की एक न चली। श्रीकृष्ण ने यादवों को समझा-बुझाकर युद्ध बंद करा दिया। सुभद्रा को लेकर अर्जुन पुष्कर तीर्थ में बहुत दिनों तक रहे। वनवास के दिन पूरे होने के बाद वे सुभद्रा के साथ इंद्रप्रस्थ पहुँचे तो माता कुंती तथा सभी पांडवों की प्रसन्नता की सीमा न रही। अर्जुन को सुभद्रा से अभिमन्यु तथा द्रौपदी से पांडवों को पाँच पुत्र प्राप्त हुए

खांडव-दाह

एक दिन अर्जुन और श्रीकृष्ण कुछ बातचीत कर रहे थे, तभी अग्निदेव ब्राह्मण के वेश में उनके सामने आए। अग्निदेव को अजीर्ण का रोग हो गया था, जिसकी केवल एक ही दवा थी कि खांडव वन के जीव उन्हें जलाने को मिलें। इसी वन में इंद्र का मित्र तक्षक सर्प भी रहता था। अग्निदेव देव जब भी खांडव वन जलाने की कोशिश करते, इंद्र वर्षा करा देते। अग्निदेव ने अर्जुन से सहायता माँगी। अर्जुन ने कहा कि मैं सहायता करने को तैयार हूँ, पर मेरे पास इंद्र का सामना करने के लिए उपयुक्त शस्त्र नहीं हैं। अग्निदेव ने अर्जुन को 'गांडीव' नाम का विशाल धनुष, 'अक्षय तूणीर' तथा 'नंदिघोष' नाम का विशाल रथ दिया। अर्जुन के संकेत पर अग्निदेव ने खांडव वन को जलाना शुरू कर दिया। इंद्र ने आग बुझाने के लिए बादलों को उड़ा दिया। तब इंद्र स्वयं अर्जुन से युद्ध करने आए। दोनों में घमासान युद्ध हुआ। इंद्र अर्जुन की वीरता पर बहुत प्रसन्न हुए। अर्जुन ने इंद्र से कहा कि यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे दिव्यास्त्र दीजिए। इंद्र ने कहा कि दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिए तुम्हें शंकर की आराधना करनी पड़ेगी। खांडव वन में केवल कुछ ही प्राणी बचे थे, जिनमें एक मय दानव भी था, जो कुशल शिल्पी था। अर्जुन ने उसे मित्र बना लिया। मय दानव ने कहा कि आपसे प्राण-रक्षा के बदले में मैं आपकी कुछ सेवा करना चाहता हूँ। अर्जुन ने मय दानव से युधिष्ठिर के लिए इंद्रप्रस्थ में अनुपम सभा-भवन का निर्माण करने को कहा, जिसे मय दानव ने सिर झुकाकर स्वीकार कर लिया। आदि पर्व के अन्तर्गत कुल उन्नीस (उप) पर्व और 233 अध्याय हैं। इन 19 (उप) पर्वों के नाम हैं- अनुक्रमणिका पर्व, पर्वसंग्रह पर्व, पौष्य पर्व, पौलोम पर्व, आस्तीक पर्व, अंशावतार पर्व, सम्भाव पर्व, जतुगृह पर्व, हिडिम्बवध पर्व, बकवध पर्व, चैत्ररथ पर्व, स्वयंवर पर्व. वैवाहिक पर्व, विदुरागमनराज्यलम्भ पर्व, अर्जुनवनवास पर्व, सुभद्राहरण पर्व, हरणाहरण पर्व, खाण्डवदाह पर्व, मयदर्शन पर्व.