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नवरात्र-पूजन


नवरात्र-पूजन
मां भगवती की पूजा और साधना के लिए नवरात्र को बेहद शुभ माना जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से नवमी तक नवरात्र होते है। मां दु्र्गे की आराधना का पर्व नवरात्र वर्ष में दो बार आता है, एक चैत्र मास में, दूसरा आश्विन मास में।
अश्विन मास की नवरात्रि के दौरान भगवान राम की पूजा और रामलीला अहम होती है जबकि चैत्र मास की नवरात्रि पूरी तरह देवी मां की पूजा पर आधारित होती है। चैत्र नवरात्र की अपनी विशिष्टता और महत्ता है।
नवरात्र पर्व पर देवी मां की आराधना करने से वह प्रसन्न होकर अपने भक्तों के सभी कष्टों का निवारण करती हैं और उन्हें सुख, समृद्धि प्रदान करती हैं। नवरात्र का पहला दिन माता शैलपुत्री की आराधना से शुरू होती है। मां दुर्गा अपने प्रथम स्वरूप में शैलपुत्री के रूप में जानी जाती हैं। पर्वतराज हिमालय के यहां जन्म लेने से भगवती को शैलपुत्री कहा गया।
नवरात्र-पूजन
पूजन विधि और कलश स्थापना नवरात्र के पहले दिन स्त्रान आदि के बाद घर में धरती माता, गुरूदेव व इष्ट देव को नमन करने के बाद गणेश जी का आह्वान करना चाहिए। इसके बाद कलश की स्थापना करनी चाहिए। इसके बाद कलश में आम के पत्ते व पानी डालें। कलश पर पानी वाले नारियल को लाल वस्त्र या फिर लाल मौली में बांध कर रखें। उसमें एक बादाम, दो सुपारी एक सिक्का जरूर डालें। इसके बाद मां सरस्वती, मां लक्ष्मी व मां दुर्गा का आह्वान करें। जोत व धूप बत्ती जला कर देवी मां के सभी रूपों की पूजा करें। नवरात्र के खत्म होने पर कलश के जल का घर में छींटा मारें और कन्या पूजन के बाद प्रसाद वितरण करें
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