प्रथम मण्डल

सूक्त 13

123. सुसमिद्धो न आ वह देवानग्ने हविष्मते |
होतः पावक यक्षि च ||

* पवित्रकर्ता, यज्ञ संपादनकर्ता हे अग्निदेव ! आप अच्छी तरह प्रज्वलित होकर यजमान के कल्याण के लिए देवताओं का आवाहन करें और उनको लक्ष्य करके यज्ञ संपन्न करें अर्थात देवों के पोषण के लिए हविष्यान्न ग्रहण करें.

124. मधुमन्तं तनूनपाद यज्ञं देवेषु नः कवे |
अद्या कर्णुहि वीतये ||

* ऊधर्वगामी, हे मेधावी अग्निदेव ! हमारी रक्षा के लिए प्राणवर्द्धक-मधुर हवियों को देवों के निमित प्राप्त करें और उन तक पंहुचाएं.

125.नराशंसमिह परियमस्मिन यज्ञ उप हवये |
मधुजिह्वंहविष्क्र्तम ||

* हम इस यज्ञ में देवताओं के प्रिय और आह्लादक(मधुजिव्ह) अग्निदेव का आवाहन करते हैं.वह हमारी हवियों को देवताओं तक पंहुचाने वाले हैं, अस्तु वे स्तुत्य हैं.

126. अग्ने सुखतमे रथे देवानीळित आ वह |
असि होता मनुर्हितः ||

* मानवमात्र के हितेषी हे अग्निदेव ! आप अपने श्रेष्ठ-सुखदायी रथ से देवताओं को लेकर (यज्ञ स्थल) पर पधारें. हम उनकी वंदना करते हैं.

127. सत्र्णीत बर्हिरानुषग घर्तप्र्ष्ठं मनीषिणः |
यत्राम्र्तस्य चक्षणम ||

* हे मेधावी पुरुषों ! आप इस यज्ञ में कुशा के आसनों को परस्पर मिलाकर इस तरह बिछाएं कि उस पर घृत पात्र को भली प्रकार रखा जा सके, जिससे अमृततुल्य घृत का सम्यक दर्शन हो सके.

128. वि शरयन्तां रताव्र्धो दवारो देवीरसश्चतः |
अद्या नूनं च यष्टवे ||

* आज यज्ञ करने के लिए निश्चित रूप से ऋत (यज्ञीय वातावरण) की वृद्धि करने वाले अविनाशी दिव्य द्वार खुल जाएँ.

129. नक्तोषासा सुपेशसास्मिन यज्ञ उप हवये |
इदं नो बर्हिरासदे ||

* सुन्दर रूपवती रात्रि और उषा का हम इस यज्ञ में आवाहन करते हैं. हमारी और से आसन रूप में यह कुश प्रस्तुत है.

130. ता सुजिह्वा उप हवये होतारा दैव्या कवी |
यज्ञं नो यक्षतामिमम ||

* उन उत्तम वचन वाले और मेधावी दोनों (अग्नियों) दिव्य होताओं को यज्ञ में यजन के निमित हम बुलाते हैं.

131 इळा सरस्वती मही तिस्रो देवीर्मयोभुवः |
बर्हिः सीदन्त्वस्रिधः ||

* इल्ला,सरस्वती और मही ये तीनो देवियाँ सुखकारी और क्षयरहित हैं. ये तीनो बिछे हुए दीप्तिमान कुश के आसनों पर विराजमान हों.
. 132. इह तवष्टारमग्रियं विश्वरूपमुप हवये | अस्माकमस्तुकेवलः ||

प्रथम पूज्य, विविध रूप वाले त्वष्टादेव का इस यज्ञ में आवाहन करते हैं, वे देव केवल हमारे ही हों.

133. अव सर्जा वनस्पते देव देवेभ्यो हविः |
पर दातुरस्तु चेतनम ||

* हे वनस्पति देव ! आप देवों के लिए नित्य हविष्यान्न प्रदान करने वाले दाता को प्राणरूप उत्साह प्रदान करें.

134. सवाहा यज्ञं कर्णोतनेन्द्राय यज्वनो गर्हे |
तत्र देवानुप हवये ||
* हे अध्वर्यु ! आप याजकों के घर में इन्द्रदेव की तुष्टि के लिए आहुतियाँ समर्पित करें. हम होता वहां देवों को आमंत्रित करते हैं.

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