प्रथम मण्डल

सूक्त 15


147. इन्द्र सोमं पिब रतुना तवा विशन्त्विन्दवः |
मत्सरासस्तदोकसः ||

* हे इन्द्रदेव ! ऋतुओं के अनुकूल सोमरस का पान करें, ये सोमरस आपके शरीर में प्रविष्ठ हों; क्योंकि आपकी तृप्ति का आश्रयभूत साधन यही सोम है.

148. मरुतः पिबत रतुना पोत्राद यज्ञं पुनीतन |
यूयं हि षठा सुदानवः ||

* दानियों में श्रेष्ठ हे मरुतों ! आप पोता नामक, ऋत्विज के पात्र से ऋतू के अनुकूल सोमरस का पान करें एवं हमारे इस यज्ञ को पवित्रता प्रदान करें.

149. अभि यज्ञं गर्णीहि नो गनावो नेष्टः पिब रतुना |
तवंहि रत्नधा असि ||

* हे त्वाग्देव ! आप पत्नी सहित हमारे यज्ञ की प्रशंसा करें, ऋतू के अनुकूल सोमरस का पान करें. आप निश्चय ही रत्नों को देने वाले हैं.

150. अग्ने देवानिहा वह सादया योनिषु तरिषु |
परि भूष पिब रतुना ||

* हे अग्निदेव आप देवों को यहाँ बुलाकर उन्हें यज्ञ के तीनो सवनों (प्रातः, माध्य एवं सांय) में आसीन करें. उन्हें विभूषित करके ऋतू के अनुकूल सोम का पान करें.

151. बराह्मणादिन्द्र राधसः पिबा सोमं रतून्रनु |
तवेद धि सख्यमस्त्र्तम ||

* हे इन्द्रदेव ! आप ब्रह्मा को जानने वाले साधक के पात्र से सोमरस का पान करें, क्योंकि उनके साथ आपकी अविच्छिन्न (अटूट) मित्रता है.

152. युवं दक्षं धर्तव्रत मित्रावरुण दूळभम |
रतुना यज्ञमाशाथे ||

* हे अटल व्रत वाले मित्रावरुण ! आप दोनों ऋतू के अनुसार बल प्रदान करने वाले हैं. आप कठिनाई से सिद्ध होने वाले इस यज्ञ को संपन्न करते हैं.

153. दरविणोदा दरविणसो गरावहस्तासो अध्वरे |
यज्ञेषु देवमीळते ||

* धन की कामना वाले याजक सोमरस तैयार करने के निमित हाथ में पत्थर धारण करके पवित्र यज्ञ में धन प्रदायक अग्निदेव की स्तुति करते हैं.

154. दरविणोदा ददातु नो वसूनि यानि शर्ण्विरे |
देवेषु ता वनामहे ||

* हे धन प्रदायक अग्निदेव ! हमें वे सभी धन प्रदान करें, जिनके विषय में हमने श्रवण किया है. वे समस्त धन हम देवगणों को अर्पित करते हैं.
(देव शक्तियों से प्राप्त विभूतियों का उपयोग देव कार्यों के लिए ही करने का भाव व्यक्त किया गया है)

155. दरविणोदाः पिपीषति जुहोत पर च तिष्ठत |
नेष्ट्राद रतुभिरिष्यत ||

* धन प्रदायक अग्निदेव नेष्टापात्र से ऋतू के अनुसार सोमरस पिने की इच्छा करते हैं. अतः हे याजकगण ! आप वहां जाकर यज्ञ करें और पुनः अपने निवास स्थान के लिए प्रस्थान करें.

156. यत तवा तुरीयं रतुभिर्द्रविणोदो यजामहे |
अध समा नो ददिर्भव ||

* हे धन प्रदायक अग्निदेव ! ऋतुओं के अनुगत होकर हम आपके निमित सोम के चोथे भाग को अर्पित करते हैं, इसलिए आप हमारे लिए धन प्रदान करने वाले हों.

157. अश्विना पिबतं मधु दीद्यग्नी शुचिव्रत |
रतुना यज्ञवाहसा ||

* दिप्प्तिमान, शुद्ध कर्म करने वाले, ऋतू के अनुसार यज्ञवाहक हे अश्विनीकुमारों ! आप इस मधुर सोमरस का पान करें.

158. गार्हपत्येन सन्त्य रतुना यज्ञनीरसि |
देवान देवयते यज ||

* हे इष्टप्रद अग्निदेव ! गार्हपत्य के नियमन में ऋतुओं के अनुगत यज्ञ का निर्वाह करने वाले हैं, अतः देवत्व प्राप्ति की कामना वाले याजकों के निमित देवों का यजन करें.
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