प्रथम मण्डल

सूक्त 2

10.वायवा याहि दर्शतेमे सोमा अरंक्र्ताः |
तेषां पाहि शरुधी हवम ||
हे प्रियदर्शी वायुदेव हमारी प्रार्थना को सुन कर आप यज्ञस्थल पर आयें. आपके निमित सोमरस प्रस्तुत है इसका पान करें.

11. वाय उक्थेभिर्जरन्ते तवामछा जरितारः |
सुतसोमा अहर्विदः ||
हे वायुदेव ! सोमरस तैयार करके रखने वाले, उसके गुणों को जानने वाले, स्तोतागण स्त्रोतों से आपकी उतम प्रकार से स्तुति करतें हैं.

12. वायो तव परप्र्ञ्चती धेना जिगाति दाशुषे |
उरूची सोमपीतये ||

हे वायुदेव! आपकी प्रभावोत्पादक वाणी, सोमयाग करने वाले सभी यजमानो की प्रशंसा करती हुई एवं सोमरस का विशेष गुण-गान करती हुई, सोमरस पान करने की अभिलाषा से दाता (यजमान) के पास पंहुचती है.

13. इन्द्रवायू इमे सुता उप परयोभिरा गतम |
इन्दवो वामुशन्ति हि ||

हे इन्द्रदेव ! हे वायुदेव ! यह सोमरस आपके लिए अभिषुत किया (निचोड़ा) गया है. आप अन्नादि पदार्थों के साथ यहाँ पधारें, क्योंकि यह सोमरस आप दोनों की कामना करता है.

14. वायविन्द्रश्च चेतथः सुतानां वाजिनीवसू |
तावा यातमुप दरवत ||
हे वायुदेव ! हे इंद्रदेव ! आप दोनों अन्नादि पधार्थो और धन से परिपूर्ण हैं एवं अभिषुत सोमरस की विशेषता को जानते हैं. अतः आप दोनों शीघ्र ही इस यज्ञ में पदार्पण करें.

15. वायविन्द्रश्च सुन्वत आ यातमुप निष्क्र्तम |
मक्ष्वित्था धिया नरा ||

हे वायुदेव ! हे इंद्रदेव ! आप दोनों बड़े सामर्थ्यशाली हैं. आप यजमान द्वारा बुद्धिपूर्वक निष्पादित सोम के पास अतिशीघ्र पधारें.

16. मित्रं हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशादसम |
धियं घर्ताचीं साधन्ता ||

घृत के समान प्राणप्रद वृष्टि संपन्न करने वाले मित्र और वरुण देवों का हम आवाहन करते हैं. मित्र हमें बलशाली बनायें तथा वरुणदेव हमारे हिंसक शत्रुओं का नाश करें.

17.रतेन मित्रावरुणाव रताव्र्धाव रतस्प्र्शा |
करतुं बर्हन्तमाशाथे ||
सत्य को फलितार्थ करने वाले सत्ययज्ञ के पुष्टिकारक देव मित्रावरुणो ! आप दोनों हमारे पूण्यदायी कार्यों (प्रवर्तमान सोमयाग ) को सत्य रूप से परिपूर्ण करें.

18. कवी नो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया |
दक्षं दधाते अपसम ||
अनेक कर्मों को संपन्न करने वाले विवेकशील तथा अनेक स्थलों में निवास करने वाले मित्रावरुण हमारी क्षमताओं और कार्यों को पुष्ट बनाते हैं.
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