प्रथम मण्डल

सूक्त 42


सं पूषन्नध्वनस्तिर वयंहो विमुचो नपात | सक्ष्वा देवप्र णस पुरः ||
यो नः पूषन्नघो वर्को दुःशेव आदिदेशति | अप सम तम्पथो जहि ||
अप तयं परिपन्थिनं मुषीवाणं हुरश्चितम | दूरमधिस्रुतेरज ||
तवं तस्य दवयाविनो.अघशंसस्य कस्य चित | पदाभि तिष्ठ तपुषिम ||
आ तत ते दस्र मन्तुमः पूषन्नवो वर्णीमहे | येन पितॄनचोदयः ||
अधा नो विश्वसौभग हिरण्यवाशीमत्तम | धनानि सुषणा कर्धि ||
अति नः सश्चतो नय सुगा नः सुपथा कर्णु | पूषन्निहक्रतुं विदः ||
अभि सूयवसं नय न नवज्वारो अध्वने | पू... ||
शग्धि पूर्धि पर यंसि च शिशीहि परास्युदरम | पू... ||
न पूषणं मेथामसि सूक्तैरभि गर्णीमसि | वसूनि दस्ममीमहे ||

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