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श्रावणी एकादशी व्रत


सावन मास के शुक्ल पक्ष की पवित्रा एकादशी पुत्रदा एवं पापनाशिनी एकादशी के नाम से प्रसिद्ध है।
य: पुन: पठते रात्रौ गातां नामसहस्रकम्।
द्वादश्यां पुरतो विष्णोर्वैष्णवानां समापत:।
स गच्छेत्परम स्थान यत्र नारायण: त्वयम्।
"जो एकादशी की रात में भगवान विष्णु के आगे वैष्णव भक्तों के समीप गीता और विष्णुसहस्रनाम का पाठ करता है, वह उस परम धाम में जाता है, जहाँ साक्षात् भगवान नारायण विराजमान हैं।
धर्म ग्रंथों के अनुसर इस व्रत की कथा सुनने मात्र से वाजपेयी यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
पवित्रा एकादशी के महत्व को भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा था।
भगवान के कथन अनुसार यदि नि:संतान व्यक्ति यह व्रत पूर्ण विधि-विधान व श्रृद्धा से करता है तो उसे उत्तम संतान की प्राप्ति होती है।
अत: संतान सुख की इच्छा रखने वालों को इस व्रत का पालन करने से संतान की प्राप्ति होती है। पवित्रा एकादशी का श्रवण एवं पठन करने से मनुष्य के समस्त पापों का नाश होता है, वंश वृद्धि होती है तथा समस्त सुख भोगकर परलोक में स्वर्ग को प्राप्त होता है।
इस व्रत के नाम के अनुसार ही इसका फल है, जिन व्यक्तियों को संतान होने में बाधाएं आती है अथवा जो व्यक्ति पुत्र प्राप्ति की कामना करते हैं उनके लिए पवित्र एकादशी का व्रत बहुत ही शुभफलदायक होता है।
इसलिए संतान प्राप्ति के लिए इस व्रत को व्यक्ति विशेष को अवश्य रखना चाहिए, जिससे उसे मनोवांछित फलों की प्राप्ति हो सके। संतान न होना बड़ा ही दुखपूर्ण है, उससे भी दुखपूर्ण है संतान का कुपात्र होना, अतः सर्वगुण सम्पन्न और सुपात्र संतान पाना दुर्लभ है। उत्तम संतान उन्हें ही प्राप्त होता है जिन्हें साधुजनों का आशीर्वाद प्राप्त हो तथा जिनके मन में ईश्वर की भक्ति हो। इस कलियुग में सुयोग्य संतान प्राप्ति का उत्तम साधन पवित्रा एकादशी का व्रत ही है।
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