योग
योग की परिभाषा क्या है? इसके बारे में सभी एकमत नहीं है. आप कई परिभाषाएं देखते हो. मैं इसकी एक सरल परिभाषा देने की कोशिश कर रहा हूँ. ज्यादा गहराई में ना जाकर इसको इसके शाब्दिक अर्थ से समझा जा सकता है. योग का अर्थ है जुड़ना. बच्चा जन्म लेते ही माँ से जुड़ जाता है. हम हमेशा किसी न किसी काम या भाव से जुड़े रहते हैं. जिस बात में आनन्द ज्यादा होगा मन उस तरफ जुड़ने की कोशिश करेगा. उससे जुड़ने पर आपका योग सिद्ध हो जायेगा. वैसे सांसारिक चीजें स्थाई नहीं होती, अतः उनसे योग टूट जाता है. ध्यान द्वारा हम भगवान से जुड़ जाते हैं. उस समय हम और भगवान के अलावा तीसरा नहीं रहता है. हमारा योग भगवान से हो जाता है. यह योग स्थाई है. भगवान अविनाशी व सर्वदा सुलभ हैं. वैसे देखने में यह सरल है मगर अभ्यास के बिना योग बैठाना मुश्किल है. क्योंकि हमारा मन बड़ा चंचल है एक जगह रुकता नहीं है, फिर योग कैसे बैठेगा? इसके लिए आपको कुछ करना पड़ेगा. बिना किये कुछ नहीं हो सकता. कोई कठिन तपस्या की जरूरत नहीं है, बस थोड़ा ध्यान एकाग्र करना आना चाहिए.
योग में शारीरिक व मानसिक दोनों पक्षों पर जोर देना जरूरी है. इसे सिर्फ योगासन(शारीरिक) से सिद्ध नहीं किया जा सकता. हाँ, अगर स्वास्थ्य अच्छा है तो अकेले मानसिक पक्ष से आप योग साध सकते हैं. आसन शरीर की शुद्धी के लिए आवश्यक है. योग के लिए मन की शुद्धी जरूरी है. अतः मुख्य प्रष्ठ पर दिए वैसे विचारों में से एक विचार लेकर आप रात-दिन उसे ही याद रखें तो योग सिद्ध हो जायेगा. एक बार सिद्ध हो जाये तो फिर इसे दूसरे विचारों पर सिद्ध करना आसान हो जाता है. एक विषय पर पकड़ हो जाये तो बाकी विषय दूर नहीं रहते.
1. विभिन्न प्रकार के आसन
2. षट्कर्म
3. योग्य गुरु का मिलना