योग में सफलता के लिए कुछ शारीरिक क्रियाएं आवश्यक है. इन क्रियायों से शरीर का स्वास्थ्य बना रहता है, और स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है. आसन, प्राणायाम के बाद इन क्रियाओं को भी करना सीखना चाहिए। इन क्रियाएँ को करना बहुत कठिन माना जाता है, लेकिन क्रियाओं से तुरंत ही लाभ मिलता है।

योग में प्रमुखत: छह क्रियाएँ होती है:-

1.त्राटक

2.नेती.

3.कपालभाती

4.धौती

5.बस्ती

6.नौली

नोट:- इनको बहुत ही सावधानी से योग्य गुरु के संपर्क में सीखना चाहिए. अगर किसी भी क्रिया का शरीर पर दुष्प्रभाव हो तो उसे तुरंत बंद कर देना चाहिए. योग्य गुरु के सम्बन्ध में आगे लेख मिलेगा.

त्राटक क्रिया

विधि:- 

जितनी देर तक आप बिना पलक गिराए किसी एक बिंदु, क्रिस्टल बॉल, मोमबत्ती या घी के दीपक की ज्योति पर देख सकें देखते रहिए। इसके बाद आँखें बंद कर लें। कुछ समय तक इसका अभ्यास करें। इससे आप की एकाग्रता बढ़ेगी।

सावधानी : त्राटक के अभ्यास से आँखों और मस्तिष्क में गरमी बढ़ती है, इसलिए इस अभ्यास के तुरंत बाद नेती क्रिया का अभ्यास करना चाहिए। आँखों में किसी भी प्रकार की तकलीफ हो तो यह क्रिया ना करें। अधिक देर तक एक-सा करने पर आँखों से आँसू निकलने लगते हैं। ऐसा जब हो, तब आँखें झपकाकर अभ्यास छोड़ दें। यह क्रिया भी जानकार व्यक्ति से ही सीखनी चाहिए, क्योंकि इसके द्वारा आत्मसम्मोहन घटित हो सकता है।

 लाभ : आँखों के लिए तो त्राटक लाभदायक है ही साथ ही यह आपकी एकाग्रता को बढ़ाता है। स्थिर आँखें स्थिर चित्त का परिचायक है। इसका नियमित अभ्यास कर मानसिक शां‍ति और निर्भिकता का आनंद लिया जा सकता है। इससे आँख के सभी रोग छूट जाते हैं। मन का विचलन खत्म हो जाता है। त्राटक के अभ्यास से अनेक प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती है। सम्मोहन और स्तंभन क्रिया में त्राटक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह स्मृतिदोष भी दूर करता है और इससे दूरदृष्टि बढ़ती है।

नेती क्रिया

नेती क्रिया को मुख्यत: श्वसन संस्थान के अवयवों की सफाई के लिए प्रयुक्त किया जाता है। इसे करने से प्राणायाम करने में भी आसानी होती है तथा इसे तीन तरह से किया जाता है:-

1.सूत नेती

2.जल नेती और

3.कपाल नेती।

1.सूत नेती : एक मोटा लेकिन कोमल धागा जिसकी लंबाई बारह इंच हो और जो नासिका छिद्र में आसानी से जा सके लीजिए। इसे गुनगुने पानी में भिगो लें और इसका एक छोर नासिका छिद्र में डालकर मुँह से बाहर निकालें। यह प्रक्रिया बहुत ही धैर्य से करें। फिर मुँह और नाक के डोरे को पकड़कर धीरे-धीरे दो या चार बार ऊपर-नीचे खींचना चाहिए। इसी प्रकार दूसरे नाक के छेद से भी करना चाहिए। एक दिन छोड़कर यह नेती क्रिया करनी चाहिए।

2.जल नेती : दोनों नासिका से बहुत ही धीरे-धीरे पानी पीएँ। गिलास की अपेक्षा यदि नलीदार बर्तन होतो नाक से पानी पीने में आसानी होगी। यदि नहीं होतो पहले एक ग्लास पानी भर लें फिर झुककर नाक को पानी में डुबाएँ और धीरे-धीरे पानी अंदर जाने दें। नाक से पानी को खींचना नहीं है। ऐसा करने से आपको कुछ परेशानी का अनुभव होगी। गले की सफाई हो जाने के बाद आप नाक से पानी पी सकते हैं।

3.कपाल नेती : मुँह से पानी पी कर धीरे-धीरे नाक से निकालें।

सावधानी : सूत को नाक में डालने से पहले गरम पानी में उबाल लिया जाता है जिससे किसी प्रकार के जीवाणु नहीं रहते। नाक, गले, कान, दाँत, मुँह या दिमाग में किसी भी प्रकार की समस्या होतो नेती क्रिया योगाचार्य के मार्गदर्शन में करना चाहिए। इसे करने के बाद कपालभाती कर लेना चाहिए।

लाभ : इस क्रिया को करने से दिमाग का भारीपन हट जाता है, जिससे दिमाग शांत, हल्का और सेहतमंद बना रहता है। इस क्रिया के अभ्यास से नासिका मार्ग की सफाई होती ही है साथ ही कान, नाक, दाँत, गले आदि के कोई रोग नहीं हो पाते और आँख की दृष्टि भी तेज होती है। इसे करते रहने से सर्दी, जुकाम और खाँसी की शिकायत नहीं रहती।

कपालभाती प्राणायाम

मस्तिष्क के अग्र भाग को कपाल कहते हैं और भाती का अर्थ ज्योति होता है। कपालभाती प्राणायाम को हठयोग में शामिल किया गया है। प्राणायामों में यह सबसे कारगर प्राणायाम माना जाता है। यह तेजी से की जाने वाली रेचक प्रक्रिया है। कपालभाती और भस्त्रिका प्राणायाम में अधिक अंतर नहीं है। भस्त्रिका में श्वांस लेना और छोड़ना तेजी से जारी रहता है जबकि कपालभाती में सिर्फ श्वास को छोड़ने पर ही जोर रहता है।

विधि : सिद्धासन, पद्मासन या वज्रासन में बैठकर सांसों को बाहर छोड़ने की क्रिया करें। सांसों को बाहर छोड़ने या फेंकते समय पेट को अंदर की ओर धक्का देना है। ध्यान रखें कि श्वास लेना नहीं है क्योंकि उक्त क्रिया में श्वास स्वत: ही अंदर चली जाती है।

लाभ : यह प्राणायाम आपके चेहरे की झुर्रियां और आंखों के नीचे का कालापन हटाकर चेहरे की चमक बढ़ाता है। दांतों और बालों के सभी प्रकार के रोग दूर हो जाते हैं। शरीर की चरबी कम होती है। कब्ज, गैस, एसिडिटी की समस्या में लाभदायक है। शरीर और मन के सभी प्रकार के नकारात्मक तत्व और विचार मिट जाते हैं।

धौती कर्म

1. वमन धौती : पाँच छ: ग्लास गुनगुना पानी पी लें। पानी में थोड़ा नमक डाला जा सकता है। इसके बाद दोनों हाथों को जाँघ पर रखकर थोड़ा आगे की ओर झुक कर खड़े हो जाइए। उड्डीयान बंध लगाकर नौली क्रिया करें। पिया हुआ गुनगुना जल को वमन के माध्यम से पूरी तरह बाहर निकाले दें। आप दो अँगुलियों को गले में डालकर वमन क्रिया का आरंभ कर सकते हैं। इस क्रिया से पित्त की अधिकता समाप्त होती है।

2. बहनीसार धौती : जमीन पर सीधे लेट जाइए। अपनी दोनों एड़ियों को नितम्बों से सटा कर रखिए। नाभी को अंदर खींच कर छोड़ें। इसका एक सौ बार अभ्यास करें। इससे पेट की अनेक बीमारियाँ दूर होती हैं। पाचन की गति बढ़ती है और शरीर स्वस्थ होता है।

3. वातसार धौती : होठों को संकुचित कर धीरे-धीरे तब तक वायु अंदर खीचिए जब तक पेट भर नहीं जाता। इसके पश्चात नौली क्रिया करें और दोनों नासिकाओं से वायु बाहर निकालें। इसे काकी मुद्रा या काकी प्राणायाम भी कहते हैं। इससे नाड़ी शुद्ध होती है, शरीर स्वस्थ और हल्का बनता है।

4. वस्त्र धौती : पतले कपड़े को मुँह के द्वारा पेट में ले जाकर फिर धीरे-धीरे सावधानी पूर्वक बाहर निकाला जाता है।

बस्ती क्रिया

बस्ती क्रिया की विधि करने में बहुत ही कठिन लगती है। कुछ लोग इसे करने में संकोच भी करें, लेकिन बस्ती क्रिया में पारंगत होने पर यह बहुत ही लाभदायक सिद्ध हो सकती है।

गणेश क्रिया : बस्ती क्रिया के पूर्व गणेश क्रिया का अभ्यास करना जरूरी है। गणेश क्रिया में पारंगत होने के बाद ही व्यक्ति बस्ती क्रिया कर सकता है। गणेश क्रिया में मध्यमा अँगुली में तेल चुपड़कर उसे गुदा मार्ग में सावधानी से डालकर उसे वामावर्त और दक्षिणावर्त घुमाते हैं। उपरोक्त क्रिया से गुदा मार्ग की गंदगी दूर हो जाती है और गुदा संकोच-प्रसार का भी अभ्यास हो जाता है।

बस्ती क्रिया : गणेश क्रिया से जब गुदा संकोच और प्रसार का अभ्यास हो जाए तब किसी तालाब में जाकर कमर तक पानी में खड़े होकर घुटने को थोड़ा-सा आगे की ओर मोड़कर दोनों हाथों को घुटनों पर दृढ़ता से जमाकर फिर गुदा मार्ग से पानी ऊपर की ओर खींचे। इसे उड्डीयान बंध लगाना कहते हैं। जब साधक उड्डीयान खोलता है तो पेट में भरा पानी बड़ी आँत में धीरे-धीरे भरने लगता है। पेट में जब पानी भर जाए तब पेट को थोड़ा इधर-उधर घुमाएँ और फिर पुनः गुदा मार्ग से पूरा पानी निकाल दें। इस क्रिया को बस्ती क्रिया कहते हैं। यह क्रिया टब में बैठकर भी कर सकते हैं।

नोट:- उक्त दोनों ही क्रिया योग के किसी जानकार व्यक्ति के निर्देशन में ही करना चाहिए। गुदा मार्ग या पेट में किसी भी प्रकार का दर्द या रोग हो तो यह क्रिया नहीं करनी चाहिए। बस्ती क्रिया के बाद आहार संयम जरूरी है। यौगिक आहार का ही चयन करें।

 लाभ : इसके अभ्यास से पेट सहित संपूर्ण शरीर शुद्ध तो होता ही है साथ ही विशेष रूप से इसे करने से इससे बड़ी आँत, लिंग और गुदा आदि के सभी रोग सर्वथा समाप्त हो जाते हैं। पेट के सदा साफ रहने से चेहरे की कांति बढ़ जाती है तथा व्यक्ति सदा जवान बना रहता है। यंग बने रहने के लिए बस्ती क्रिया करने वाले साधक को प्रतिदिन सात्विक तथासम्यक आहार और ज्यूस का ही प्रयोग करना चाहिए।

न्यौली क्रिया

 पेट को हिलाने की क्रिया को न्यौली क्रिया कहा जाता है। इसे नौली भी कहते हैं। नौली इसलिए क्योंकि इसे करते वक्त पेट में नली जैसा आकार उभरता है। यह क्रियाओं में सर्वश्रेष्ठ है। यह पेट के लिए महत्वपूर्ण व्यायाम माना जाता है।

विधि:- पद्मासन लगाकर दोनों हाथों से दोनों घुटनों को दबाकर रखते हुए शरीर सीधा रखें। इसके बाद पूरा श्वास बाहर निकालकर खाली पेट की माँसपेशियों को ढीला रखते हुए अंदर की ओर खींचे। इसके बाद स्नायुओं को ढीला रखते हुए पेट में दायीं-बायीं ओर घुमाएँ। इससे पेट में किसी प्रकार की गंदगी नहीं रह पाती और अपानवायु वश में आ जाती है।

इसे इस तरह भी किया जा सकता है:-

1.उड्डीयान बंध- मुँह से बल पूर्वक हवा निकालकर नाभी को अंदर खीचें उड्डीयान बंध यह है।

2.वामननौली- जब उड्डीयान बंध पूरी तरह लग जाए तो माँसपेशियों को पेट के बीच में छोड़े। पेट की ये माँसपेशियाँ एक लम्बी नली की तरह दिखाई पड़ेगी। इन्हें बाएँ ले जाएँ।

3.दक्षिण नौली- इसके पश्चात इसे दाहिनी ओर ले जाएँ।

4.मध्यमा नौली- इसे मध्य में रखें और तेजी से दाहिने से बाएँ और बाएँ से दाहिनी ओर ले जाकर माँसपेशियों का मंथन करें। इसे तब तक करें जब तक सुविधाजनक लगें। इसके लाभ- इसे नियमित करने से गर्मी संबंधी सभी रोग, वायु विकार, गोला, सभी प्रकार के दर्द आदि दूर होते हैं, जो फिर कभी नहीं होते। पेट संबंधी सभी रोग भी इससे दूर होते हैं। इससे भूख बढ़ती है। यकृत, तिल्ली और पेट से संबंधित अनेक बीमारियों से मुक्ति मिलती है। इसके अभ्यास से प्रखर स्वास्थ्य प्राप्त होता है।

शरीर जीवात्मा का घर है। प्राणों की क्रियाएँ संतुलित और समतापूर्ण हो इसके लिए इसकी यदा-कदा सफाई करते रहने की आवश्यकता होती है। षट्‍कर्म का अभ्यास प्रतिदिन नहीं किया जाना चाहिए। जब व्यक्ति अपने शरीर में कफ, पित्त और वायु की अधिकता अनुभव करे तो इसको करना चाहिए।

शौच (शुद्धता) दो प्रकार का होता है। शारीरिक और मानसिक (वाह्म और आंतरिक) षट्‍कर्म ऐसी क्रियाएँ हैं जिससे शारीरिक (वाह्म) शुद्धता प्राप्त होती है। राग, द्वेष, अहंकार, काम, क्रोध, लोभ इत्यादि आंतरिक अशुद्धियाँ हैं। केवल वाह्म शुद्धता ही पर्याप्त नहीं है। योगी को मानसिक शुद्धि भी अवश्य करनी चाहिए। काम, क्रोध, लोभ, द्वेष इत्यादि मानसिक मलिनताएँ शरीर के अंदर विषैले पदार्थ उत्पन्न करते हैं। अशुद्ध भावनाओं के कारण प्राणों में असंतुलन हो जाता है। शरीर के विभिन्न अवयव इससे प्रभावित हो जाते हैं। तंत्रिकातंत्र दुर्बल हो जाता है। इसलिए शरीर को स्वस्‍थ और शक्तिशाली बनाने के लिए मानसिक मलिनताओं को दूर करना आवश्यक है। भय से हृदय रोग होता है। दु:ख से तंत्रिकातंत्र असंतुलित हो जाता है। निराशा से दुर्बलता होती है। लोभ प्राणों को असंतुलित करता है जिससे अनेक प्रकार के शारीरिक रोग उत्पन्न होते हैं। अहंकार जीवन की पूर्णता का आनंद नहीं लेने देता। इससे पाचनतंत्र तथा किडनी संबंधी रोग होते हैं।

अधिकांश बीमारियाँ रोगी की मानसिक विकृतियों के ही कारण हुआ करती हैं। इसी प्रकार ध्यान से संपूर्ण शरीर में प्राणों का प्रवाह निर्बाध गति से संचारित होता है। यह हृदय की अनेक बीमारियों को दूर करता है। उदारता हृदय को प्रफुल्लता प्रदान करती है। इससे सिर दर्द, स्नायुओं की दुर्बलता और व्यग्रता सपाप्त होती है। करुणा के अभ्यास से शरीर में अमृत का प्रवाह बढ़ता है। मानसिक शांति से शरीर में प्रचुर मात्रा में शक्ति आती है। प्रत्येक सद्‍गुण से प्रखर स्वास्थ्य और सुख की प्राप्ति होती है। पतंजलि महर्षि के अनुसार तप (शारीरिक और मानसिक), स्वाध्याय (सद्‍ग्रंथों का अध्ययन एवं ईश्वर नाम का जप) और ईश्वर प्राणिधान (ईश्वर के प्रति शरणागति का भाव) क्रिया योग कहलाता है।

1. विभिन्न प्रकार के आसन
2. षट्कर्म
3. योग्य गुरु का मिलना
4. योग