योग्य गुरु का मिलना कोई दुर्लभ नहीं है. एकलव्य ने किस तरह गुरु द्रोणाचार्य को गुरु बनाकर विद्या सीखी थी, हम इतिहास से यह सब जानते हैं. अगर सचमुच गुरु मिल जाता है तो बहुत अच्छी बात है, कैसा भी हो गुरु में दोष नहीं देखना चाहिए, परन्तु व्याहारिक तोर पर सच्चे गुरु का मिलना कठिन है. इस हालत में हमें पहले वाले रास्ते की तरह का ही मार्ग चुनना पड़ेगा.

अगर आप का कोई इष्ट देव है तो आप उसे गुरु मान सकते हो. आप सोचोगे इष्ट देव तो है मगर वह हमारे पास योग सिखाने थोड़े ही आएगा या कोई एसी बात की आपको लगे इष्ट देव मुझे योग कैसे सिखायेंगे. इन बातों को आप दिल से निकाल दीजिये. आप तो उनको गुरु मानकर योग में लग जाये, जहाँ भी आपको या आपके मन या शरीर को लगे की मुझे कोई लाभ नहीं हो रहा है, आप योग का रूप,प्रकार बदल दीजिये. इस कार्य में आपका गुरु आपकी जरूर मदद करेगा. गुरु के प्रति आपका क्या कर्तव्य है, उसका आपको पालन करना पड़ेगा. अगर आप शिष्य का फर्ज निभा रहे हैं तो वे गुरु का फर्ज जरूर निभाएंगे, इसमें कोई शक नहीं है.

योग के क्षेत्र में शंकर भगवान  सर्वोपरि हैं. आप उनको गुरु बनाकर हर प्रकार के योग सीख सकते हो. बस सोते,उठते,बैठते,जागते,चलते,कोई भी काम करते गुरूजी अर्थात शंकर भगवान को याद करते रहें... और योग चालू करे आप कभी गलत दिशा में नहीं जा सकते. आपका शरीर बता देगा की आप सही रास्ते पर जा रहे हैं कि नहीं.

एक अन्य विधि है अपने आप को गुरु मानना. जीहाँ यह कोई गलत नहीं है. आत्मा सो परमात्मा. आप किताबों में पढ़कर सावधानी से योग कर सकते हो, वे योग करो जिनको करने से शरीर को कोई हानी न हो. कोई जरूरी नहीं कि आप खतरनाक योग ही करो, आप सबसे सरल योग को लेवो, जैसे मुख्य पेज पर या विवेकानन्द के विचार हैं उस तरह का कोई भी भाव मन में लेकर उसके पीछे लग जावो, लगे रहो एक दिन सफलता जरूर मिलेगी. एक क्षेत्र में योग सिद्ध हो जाये तो समझलो आप सफल हो गए. रास्ते अनेक हैं मगर परमात्मा एक ही है. आप कोई से एक रास्ते से चलकर वहाँ तक पंहुच सकते हो. बस मन में दृढ विश्वास रखें.

1. विभिन्न प्रकार के आसन
2. षट्कर्म
3. योग्य गुरु का मिलना
4. योग